कला-साहित्य

अपना आप ही भूल गई हूँ

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

मन में उठ रहे सवाल,कैसा है ये मोह का जाल
कभी बच्चे आड़े आए, कभी पति का ख्याल
सबको पाल रही हूँ, इसमें बुरी तरह डूब गई हूँ
कि अपना आप ही भूल गई हूँ
बस अपना आप ही भूल गई हूँ l

माँ- बाप का ख्याल,उनसे जुड़ा है सवाल
फिर सास- ससुर, पूरा ही परिवार
सबको पाल रही हूँ, पर पता ही ना चला
कि अपना आप कब भूल गई हूँ
बस अपना आप ही भूल गई हूँ l

दो हाथ नहीं मेरे, कितने हाथ काम करते
घर पर जब होएं सब काम,ये दस बनकर चलते
ऊरी जैसे मैं घूम रही हूँ,पर पता ही ना चला
कि मैं अपना आप ही भूल गई हूँ
बस अपना आप ही भूल गई हूँ l

अभी भी संसार,कहे नारी को भूँ पे भार
जब इसके बिना ना, देवता भी लें अवतार
यही सोच सोच ऊब गई हूँ,पर पता ही ना चला
कि मैं अपना आप ही भूल गई हूँ
मैं अपना आप ही भूल गई हूँ l

करमजीत कौर,शहर- मलोट, जिला श्री मुक्तसर साहिब, पंजाब

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