कला-साहित्य

अबला नारी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

मोहन एक विधवा मां का आज्ञाकारी बेटा,जिसे जमाने के रंग लगे ही नहीं थे।सीधा अपने काम से काम रखनेवाला था वह।कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर सरकारी नौकरी में लग गया।बाबू बन गया तो शादी के लिए रिश्ते आने लगे।देखी कुछ लड़कियां लेकिन किसी के लिए भी मन नहीं माना। मां का दबाव बढ़ता जा रहा था।वह भी सोच ही रहा था कि किसी एक को हामी भर ही दे ।फिर और एक ओर रिश्ते की बात चली ,उत्साह कम हो गया था ,इतनी लड़किया देख ने के बाद भी सही कोई भी लग नही रही थी।

 फिर भी दफ्तर से आके तैयार हो मां के साथ सांवली के घर की और चल पड़ा।सुना था बिन मां बाप की चाची और चाचा के आसरे पली बढ़ी थी वह। मां बाप की मृत्यु एक अकस्मात में हो गई थी जब वह पांच साल की थी।

  पूरे रास्ते  सांवली कैसी होगी यही सोच रहा था।कोई श्याम सी ,कम ऊंचाई वाली और पतली सी लड़की की कल्पना लिए वह सांवली के घर पहुंचा।

 सांवली की चाची पुष्पा ने खूब अवभागत की,कुछ जानपहचान वालों के बारे में  भी  बाते हुई और सांवली अपनी चचेरी बहन के साथ कमरे में आई।मोहन ने एक नजर सांवली को देखा तो देखता ही रह गया।उसने जो सांवली की सामान्य सी छवि बनाई थी उससे एकदम ही विपरीत,चंपई गोरा  रंग,छरहरी काया ,करीने से संवारे लंबे ,भूरे बाल और चेहरे पर एक आत्म विश्वास।बस ऐसी ही तो लड़की चाहिए थी उसे।थोड़ी देर बातें भी हुई और उसके विचार जानके तो ज्यादा ही प्रभावित हो गया मोहन।

 घर आने के बाद भी सिर्फ सांवली के बारे में ही सोचता रहा और पहले देखी लड़कियों से तुलना करता रहा। मां ने भी टटोला कि कैसी लगी लड़की तो बेबस बोल ही पड़ा कि अपनी और से हां का संदेश पंडितजी के हाथ भेज ही दें।

 और फिर तो रस्मे शुरू हो गई।रोका हो गया तो फोन पे हफ्ते में एकाद बार बात हो जाती और उसी बातों के आसरे वह दुबारा बात करने तक मन मनाता रह जाता था।

तीन महीने बीत चुके थे और सगाई का मुहरत देखा गया और अपनी हैसियत के हिसाब से चुन्नी और कुछ गहने और कुछ सौगातें ले थोड़े रिश्तेदारों के साथ जा रस्म पूरी की।सांवली को देख मन में प्यार उभर आया और जल्दी से अपना बनाने को दिल चाहा।

 दो महीने बाद वो दिन भी आया, सादगीसे से शादी कर अपने सपने को घर ले आया।गृहप्रवेश के बाद,  रस्मो का सिलसिला चला हसीं मजाक और ठिठोलियों   के बाद  सांवली को अपने कमरे में   पहुंचाया गया , खुद भी उतावला हो रहा था कि कब सब मित्र और रिश्तेदार इधर उधर हो और वह सांवली के पास पहुंचे।वह घड़ी भी आई और वह अपने शयन कक्ष में पहुंचा, तो देखा कि सांवली उसकी प्रतीक्षा में बैठी थी।कुछ सामान्य बात से शुरू करी बातें कब प्यार की राहों पर चलपड़ी पता ही नहीं चला।सुबह उठा तो सांवली नहीं थी उसके बगल में,सोचा जरूर मां के पास रसोई घर में होगी।वह भी गुसल से निकल रसोई घर पहुंचा तो मां और सांवली बातें करते करते रसोई में काम कर रहीं थी।दोनों को खुश देख उसे भी प्रसन्नता हुई।

 थोड़ी देर बाद नाश्ता आया तो स्वादिष्ट  पूड़ी और आलू की सब्जी खाई। मां की बनाई पूड़ी सब्जी स्वाद तो बहुत होती थी लेकिन सांवली के हाथों में तो जैसे जादू ही था।

 ऐसे ही कुछ दिन निकले और छुट्टियां खत्म,वही दफ्तर की रफ्तार में जिंदगी आगे बढ़ ने लगी।

 सांवली मायके गई हुई थी, मां चाय ले मोहन के पास आ बैठी,दफ्तर में कैसा चल रहा है  इत्यादि पूछ ने के बाद बोली, एकाएक बोली कि अभी शादी हुए दो साल हो गये हैं और बच्चे के बारे में क्यों नहीं सोच रहे है वे दोनों?मोहन ने भी सोचा कि मां की बात तो सही थी लेकिन उसे तो सांवली के प्यार से आगे ऐसी सोच आई ही नहीं थी।उसने भी मां को आश्वासन दिया और सांवली को धर लिवाने के लिए चल पड़ा।

 ऐसे ही कुछ साल और निकल गए और मां की बच्चे के बारे में मांगे तीव्र और अति तीव्र होने लगी थी।अब तो उसे खुद भी लग रहा था की अब तक क्यों नहीं हुए बच्चे। मां का व्यवहार सांवली की ओर धीरे धीरे बदलता जा रहा था और क्लेश का अधिपत्य बढ़ रहा था घर में।वह भी परेशान रहने लगा,और सांवली के लिए भी चिंता होने लगी।अब मां सारा दोष  सांवली पर डाल ने लगी थी,उसे बांज तक कह चुकी थी मां।इन परिस्थियों को संभाल ने में अपने आप को असमर्थ सा पाने लगा मोहन।खुद भी दफ्तर में अनमना सा  रहने लगा।उसका सहकर्मचारी जो उसका दोस्त भी था उसने पूछ ही लिया कि कुछ महिनों से मोहन उदास क्यों रहता था? सांत्वना के कुछ शब्द से मोहन की व्यथा बह निकली।उसने सब कुछ बता दिया।दोस्त ने उसे तबीबी सलाह लेने को बोला तो मोहन भी मान लिया कि अब डॉक्टर से सलाह ले लेनी चाहिए।और दफ्तर से थोड़ा जल्दी निकलकर डॉक्टर से मुलाकात की ,कुछ मुआयने किए , खून की जांच के लिए खून दे वह घर पहुंचा।वही तनाव जो घर में दिन ब दिन बढ़ रहा था ,गमगीन सी सांवली और क्रुद्ध मां को देख मन दुःख से भर जाता था।हीनभावना ग्रसित किए जा रही थी सांवली को,अपने आप को दोषी मान  अपने को कोसती रहने वाली सांवली के चेहरे से रौनक खत्म हो चुकी थी।

 दूसरे दिन भी दफ्तर से सीधा डॉक्टर के पास जाके  अपनी रिपोर्ट ले घर की ओर चल पड़ा मोहन,कुछ ठीक नहीं था रिपोर्ट में,उसमे कमी थी ,वह बाप नहीं बन सकता था।उदास सा घर पहुंचा तो मां चाय ले आई,उसने इधर उधर देखा तो सांवली नजर नहीं आई,उसने मां से चाय ली और बरबस ही पूछ बैठा कि सांवली नही दिखाई दे रही। मां ने कड़ाई से जवाब दिया कि जो मां न बन सके उसका इस घर में कुछ काम नहीं हैं।उसे घर से निकल दिया था मां ने।मोहन सकपका गया और एक क्रुद्ध नज़र से मां को देख ,चाय का कप वही रख ,जूते पहन बाहर निकल गया वह ,अत्मग्लानी से भरा वह सांवली के चाचा के घर पहुंचा तो देखा वहा भी सांवली नहीं थी।बहुत कुछ चाचा–चाची ने सुनाया उसे पर वह खोया खोया ही रहा,कुछ न सुनाई दे रहा था न ही समझ में आ रहा था।वहां से उठ घर की ओर  चल पड़ा और अपने कमरे में जा निढ़ाल सा लेट गया बिस्तर पर।अपनी शारीरिक कमी की सजा बेकसूर सांवली को मिली थी।सोच रहा था कि कहीं से भी यकायक प्रगट हो सांवली उसे सामने आजाये ,लेकिन वह अकेला रह गया था ये एहसास उसे परेशान करता रहा।दूसरे दिन सुबह दफ्तर से छुट्टी ले सांवली की तलाश में मारा मारा फिरा लेकिन कोई भी सुराख नहीं मिला कि वह कहां गई होगी। हार कर पुलिस स्टेशन जा गुमशदगी की कंप्लेन दर्ज कराई और घर आ पहुंचा।दिनोदिन बुरे खयाल आते रहे,कुछ अनहोनी न हो जाए उसके साथ ये खयाल से सिहर जाता था मोहन।ऐसे ही  दो साल बीत गये और सांवली का गायब हो जाना पहेली सा बन गया था। वह खुद घर से कट सा गया था, मां से बात करने का मन भी नहीं करता था।पिता की मृत्यु के बाद बहुत दुःख सह कर पाला और पढ़ाया था मां ने किंतु उसके त्याग के लिए उसको इतना बड़ा बलिदान देना मंजूर नहीं था।

 एक दिन किसी काम से पास के शहर जाना हुआ ।लौट ते  वक्त वह अपनी सीट पर बैठा था,यात्रियों से भरा पड़ा था रेल का डिब्बा,एक तो भीड़ उसमें सब फेरी ले चाय,पकोड़े , कचोड़िया और क्या क्या ले के बेच रहे थे।उपर से  भीख मांगने वाले,कभी घुटना छू के तो कभी कंधा छू अपनी मांग को प्रबल बनाते थे। वही एक मैले कुचैले कपड़ो में गोरी किंतु मेली सी औरत जिसकी  गंदे कपड़ो में भी सुंदरता नहीं छुप  रही थी वह पेट से भी लग रही थी।उसने सरसरी तौर पर देख नजर  हटाली।किंतु दूसरे ही पल चौक सा गया येतो सांवली लग रही थी,उसने और ध्यान से देखा तो उसे पक्का हो गया कि वह सांवली ही थी।उसके करीब गया तो वही अचकुचाई और सिमट के बड़ी बड़ी आंखें निकाल उससे दूर जाने लगी।नाम ले के पुकारने पर भी उसे कुछ फर्क नहीं पड़ा,बोहराई सी अजनबी नजरों से देखती रही।मोहने ने अपना नाम भी बताया किंतु बेखबर ,अजनबी सी नज़रों से देखती रही।सब मुसाफिरों की नज़र उन दोनों पर थी ,मोहन ने सब से प्रार्थना की कि वह स्त्री उसकी पत्नी थी और वे हो सके तो उसे मदद करें,वह उसे अपने घर ले जाना चाहता है,तो कुछ महिलाएं आगे आई और उसे हाथ पकड़ के गाड़ी से नीचे उतरा और वह स्टेशन से बाहर आ रिक्शे में बिठा घर की और चला ।घर ले जा के उसे नहला धुला के खाना खिलाया किंतु वह अपने होश तो कभी की को बैठी थी।दूसरे दिन महिला डॉक्टर और मानसिक रोग के डॉक्टर की दिखाया ।महिला डाक्टर ने बताया कि उसके पेट में  सात महीने का गर्भ था और मां बच्चे दोनो की सेहत ठीक थी।मानसिक रोग के डॉक्टर ने बताया कि कोई बहुत बड़े सदमे ने उसके ये हाल किए हैं।प्यार और समय ही उसका इलाज़ था।

 घर आके सोचा कि मां नही बन सकने का लांछन लिए सांवली अनचाहे ,जबरदस्ती दिए गए बच्चे को अनजाने ही अपने गर्भ में पाल रही है।नम आंखो से मोहन ने उसे गले लगाया,अब वह न पहचानते हुए भी मोहन पर विश्वास करने लगी थी। मां भी लज्जित थी उसकी हालत देख कर। दुःखी

 हो रही थी कि उसकी बहु की मानसिक हालत का फायदा उठाते हुए नरपिचाश से मनुष्य ने उसके नारीत्व का अपमान  कर एक जघन्य अपराध किया था।अपने आप को भी दोषी मान ने लगी थी वह।सारा दिन सांवली के इर्द गिर्द रह उसकी सुख सुविधाओं का ध्यान रख ने के अलावा उसे कुछ सूझता ही न था। शायद अपने व्यवहार का प्रायश्चित कर रही हो।

 अब मोहन  मां के साथ मिलके उसके प्रसव का इंतजार कर रहा  था ।

जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद

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