कला-साहित्यविचार

अमर लय पर बजने दो

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

भाव की वीणा पर बजने दो,

उर गति उच्छ्वास ।

अमर लय में बजने दो,

हृदय की मधुरिम आस।

संदल की मधुगंध आ रही,

दूर क्षितिज से।

सुभाषित करती,

हृदय का कोना कोना।

आलौकिक उस तेजपुंज में,

तन और मन।

निखर गया होकर सोना सोना।

जैसे बुझती इन उत्सो से

दिग दिगंतर की अमर प्यास।

अमर लय में बजने दो,

हृदय की मधुरिम आस ।

नैनो की परिधि तक फैली,

तेरी धवल रश्मिया।

दूर तक फैली तेरी,

शीतल निर्मल छाया।

दिव्य दर्शन की अनुभूति से,

निरामय  हो जाती।

सदियों की कुलषित  काया ।

ग्रीष्म के तपते क्षण क्षण में,

देता शीतलता तेरा,

अविनाशी मधुमास।

अमर लय में बजने दो,

हृदय की मधुरिम आस।

कामिनी मिश्रा,वरिष्ठ गीतकार कवयित्री 

व शिक्षिका,बीघापुर,उन्नाव,उत्तर प्रदेश 

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