कला-साहित्यविचार

एक अदद स्मारक

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

कोई शोर नहीं 

होगा भी कैसे?

किसी कॉरपोरेट या नेता की बीबी मरी है क्या

किसी को कानोंकान पता भी न चला

कैसे पता चले?

टीवी-मीडिया  उनके लिए है क्या?

खबरों को भी खबर नहीं

शहादत के नाम पर भावना बेचने 

हाँ कुछ स्थानीय लोगों में सुगबुगाहट थी

वैसी ही जैसी किसी के मृत्यु के पहले

आता है उसके शरीर में एक कंपन

और फिर शरीर ठंडा गोश्त

समाज भी ऐसे हो गया है 

मानो आँखे खुली है पर दिमाग सो गया है

वैसे ही एक अदद स्मारक की चाह लिए

मिट्टी हो गई, बलमदीना एक्का

बेवा, परमवीर चक्र विजेता अल्बर्ट एक्का की

एक नेक, सरल प्रकृति प्रेमी

समाज को मौन वाणी देने वाली

इंतजार करती रही झारखण्ड की सरकारों से

राष्ट्रवादी और स्थानीय भावनाओं से खेलने वालों से

सैनिकों के शहादत पर लंबा लंबा भाषण देने वालों से

आदिवासियों का मसीहा बनने वालों से

सैनिकों का हमदर्द बनने वालों से

राँची के चौराहे पर एक्का की मूर्ति लगाने वालों से

बहुत मशक्कत से एक्का की मिट्टी लाने वालों से

बलमदीना ने हीरे जवाहारात तो नहीं मांगे

माँगी थी एक अदद स्मारक 

अपने पति की उनके पैतृक गांव में

टकटकी लगा लगा कर देखती रही

कब शौर्य समाधि बने पति का

जिसने दुश्मनों को लोहे का चना चबवा दिया

इकहत्तर के भारत पाक युद्ध में

उस अगरतल्ला के धुलकी गाँव में

पायी जिसने वीर गति

पर देखो सरकार की मति

नहीं पूरी कर सकी हरसत 

एक अदद स्मारक की

पूछता हूँ हितैषी जी से 

क्या आपने ठीक लिखा है

शहीदों की चिताओं पर लगेगें हर बरस मेले।

वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा।

-संतोष पटेल

नई दिल्ली

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