
युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
सृष्टि के सर्जनहार पर अब हर मन में संशय उठ रहा है, दुर्गा माँ, और महाकाल बाप है, अपने बच्चों की यातना पर क्यूँ इन्हें मलाल नहीं हो रहा है।
ऐसा तो नहीं की पापी और धूर्त ही मर रहे है मर तो वो भी रहे है जिनकी हर साँस में दुर्गा और महाकाल के निरंतर नाम बह रहे है।
क्यूँ पूजते आ रहे है सैंकडों सालों से सब इन्हें धूप-दीप दूध-चंदन चढ़ाते, सो गए है सारे देवी देवता या प्रार्थना की पुकार कम पड़ रही है।
मंज़र भयावह और ज़िंदगीयाँ जूझ रही है हर तरफ़ मौत की गूँज उठ रही है पुकार करते उठते हाथ की उर्जा क्यूँ उस अर्श की चौखट तक नहीं पहुँच रही है।
कहीं बच्चों की माँ बिछड़ रही तो कहीं सर से पिता का साया, किसीके बेटे चल बसे तो कोई विधवा रो रही है, मातम की चीखों पर भी क्यूँ आसमान में शांति छाई है।
माना कि इंसान अपनी करनी का फल भुगत रहा है सज़ा की सुनवाई तो कर देते है माँ-बाप पर बच्चों की तकलीफ़ पर माफ़ी की जोगवाई भी जल्दी होती है।
क्यूँ पिघल नहीं रही तेरी करुणा की धूनी मधुकर वसुधा की हवाएं कड़वी हो रही है, अमृत की संकल्पना ही हमारी झूठी थी या कलयुग के चलते तुम्हारी भी नीतियों में खोट आ गई है।
उम्मीद को कब तक बाँधकर रखें कहीं कोई आहट नहीं आपकी प्रभु, प्रार्थना के शब्द आँसू में ढ़ल गए सुनाई नहीं देता डूबती साँसों का शोर या आपकी फ़ितरत रुदन की आदी हो गई है।
करो कोई करिश्मा जगदाधार मृत्यु लोक पर महेर करो गर हो कहीं तो दार्शनिक न बने रहो, रह जाए मन की शंका मन में और आपका मान बढ़ जाए कुछ ऐसा करो।
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु




