up government
कला-साहित्य

खिलने दो कच्ची कलियों को

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

खिलने दो कच्ची कलियों को
तुम यूँ ही तोड़ गिराना ना
महकने दो तुम बगिया को
इनको तुम मसल गिराना ना l

कच्ची कली खिले जब बागों में
खूब बागों को महकाती है
कभी खुशी पर, कभी गमी में
बाखूबी कर्तव्य निभाती है l

जब फूल सी लड़की खिल जाए
जब जोबन की ऋति आए
तो ये लड़की फूली ना समाती है
ये बनकर फूल के जैसे ही
मायका और ससुराल महकाती है l

जब इन कलियों को, खिलने ना दोगे
बोलो खुशियाँ कहाँ से लोगे
नारी के जीवन से ही, ये संसार की
नदिया बहती है, खिलने दो मुझको
तुम जरा, ये कच्ची कली तुमसे कहती है l

करमजीत कौर, मलोट, पंजाब

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button