आलेख

जिंदगी एक जंग है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

हम दुनिया की सबसे अजीब जंग लड़ रहे हैं। किन्हीं दो लोगों की सांस एक-दूसरे के पास नहीं आ सकतीं। कोई चार हाथ नहीं मिला सकते। कोई हंसी नहीं फैला सकता। कोई रास्ता हिल नहीं सकता। हम सब चुपचाप एक अजीब जंग लड़े जा रहे हैं।

हर घर बंकर सा लग रहा है। हर गाँव निशब्द बटालियन सा आभास करा रहा है। हर हृदय की दीवार पर बंदूक की गोली लटक रही है। यह दुनिया अणुबम के घेरे में घिर गयी है। हर इंसान खुद से डरा हुआ है। प्रतिक्षण सिर पर मौत मंडरा रही है।

हम जाने-अनजाने इस जंग के शामिल हो चुके हैं। हमारी गंदगी हमारे खिलाफ अस्त्र-शस्त्र बनकर हमारा पीछा कर रही है। हमारी भूख ब्रह्मास्त्र बनकर हमारे पीछे लगी हुई है। हमारी मूर्खता इंद्रास्त्र बनकर आग उगल रही है। जात-पात और धर्म के झगड़े मरणास्त्र बनकर जीवन को होम करने पर तुले हैं। ऊपर से प्रकृति का चित्कार अलग से। हमारी भावी सोच अंधी हो चुकी है और हमें भय से कंपकपा रही है। कर्ण की मृत्यु के कई कारण थे। जो भी हो हम भी कर्ण की तरह जिंदगी और मौत की जंग में खड़े हैं। हमारी मौत किससे होगी यह तो हमारा भाग्य तय करेगा।

यह जंग धरती की  चाल को बदलकर रख देगा। विकसित देशों की अति लालसा का परिणाम निरपराध देशों को भुगतना पड़ रहा है। मानव संतति खतरे में है। यह जंग समस्त जीव संपदा को लीलने वाली है। प्रकृति के क्रोध की पराकाष्ठा ही इस जंग का परिणाम होगा। यह जंग हमें नई सोच और नई राह की ओर ले जाने वाला है। हम जाने-अनजाने जंग में हैं।

हाँ, हम जंग में हैं। अब तक जो धैर्य का बांध था, अब वह टूट रहा है। साहस जवाब दे रहा है। शरीर चरमरा रहा है। सांसे गिड़गिड़ा रही हैं। हमने ताली, थाली सब पीटा। शायद अब छाती पीटने की बारी है। हर दिन हजारों निर्बोध, निरीह, निष्कलंक लोगों की कराह हृदय को तार-तार करती जा रही है। आस के जलाये दीये शरीर के साथ बुझने लगे हैं।

यह जंग किसी भी हाल में रुकना चाहिए। जीत हमारी होनी चाहिए। मानव संतति के विकास भंडार में जीवन मिटाने वाले अस्त्र-शस्त्र नहीं, मानव को मानव की तरह देखने वाले ज्ञान-विज्ञान की आवश्यकता है। प्रकृति को प्रकृति की तरह देखने की आवश्यकता है। केवल दुआओं से जिंदगी की जंग जीते नहीं जाते, अब दवाइयों की जरूरत है। ऑक्सीजन की जरूरत है। अस्पतालों की जरूरत है। प्रार्थना करने वालों की होंठों के साथ-साथ सहायता करने वाले हाथों की जरूरत है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657

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