
युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
प्रो॰ राजकुमार जैन
सुबह पहले टेलीफोन की घंटी बजी और साथ ही एक एस॰एम॰एस॰ भी आ गया, खोलकर पढ़ा तो सन्न रह गया। दिल्ली में उर्दू अदब के मशहूर कलमकार तथा बडे़ सरकारी औहदे से फ़ारिग हो चुके मित्र अज़ीम अख़्तर ने ख़बर दी कि ‘मुजीब नहीं रहे।’
लगभग पिछले पचास सालों से मुजीब भाई से दोस्ताना ताल्लुकात बने हुए थे। चाँदनी चौक बल्लीमारान के बाशिंदें मुजीब से, चाँदनी चौक घंटाघर पर आशाराम चायवाले के ठेले पर रात को जमने वाले मजमें में मुलाक़ात हुई थी, जो रोज-बरोज और गाढ़ी होती चली गई। मुजीब एक दौर में हर तरह के सियासी रंग में रंगे दिल्ली के नौजवानों के चेहते थे। बिना किसी पार्टी से बंधे मुजीब, कांग्रेसी, जनसंघी, समाजवादी, कम्यूनिस्ट सभी विचारधारा के खूँटे से बंधे नौजवानों का मिलन केंद्र बने होते थे। रात्रि को बेनागा, कनाट प्लेस के कॉफी हाउस, रैम्बल, टी हाउस, द पार्लर वगैरह में एक मेज़ पर उनके इर्द-गिर्द दोस्तों का जमावड़ा लगा होता था। कौन आया है या नहीं, किसी की किसी को ख़बर करनी है यह काम मुजीब खुशी-खुशी करते थे। उनकी मेज़ पर कॉफी वड़े आदि का जो बिल आता था उसको मुजीब पेन्ट की अगली जेब में मुड़े-तुड़े लिपटे हुए नोटों में से निकालकर करते थे। उस वक़्त की संगत के कई साथी मर्कज और सूबों की सरकारों में, वजीर-नामी अख़बार नवीस, बड़े-बड़े सरकारी ओहदों पर रहे है। जिसकी फहरीशत बहुत लंबी है।
बरसो-बरस, मुसलसल ईद के दिन उनके बल्ली मारान के ‘जयत प्रेस’ के आफिस में ईद की दावत चलती थी। सुबह से लेकर रात तक, दोस्तों के आने का तांता लगा रहता था। उनके इस खुलुश को देखकर मुझे अहसास हुआ कि मुझे भी दिपावली अपने मुस्लिम दोस्तों के साथ मनानी चाहिए। मुजीब भाई, जिन्हें मैं प्यार से मुजीब पंडित कहता था, वे तथा उनके साथ अजीम अख़्तर व एक दो अन्य साथी उस मौके पर आए भी, परंतु बहुत दिनों तक वो सिलसिला निभ न सका।
मुजीब की तरह उनके मरहूम वालिद आदरणीय हबीबुर रहमान जिस खुशी से आनेजाने वालों का इस्तबाल करते थे, वो मंजर आज भी आँखों के सामने घूम रहा है। अक्सर रात को कनाट प्लेस के ओडियन सिनेमा के सामने से तांगे में बैठकर, हौजकाजी तक जब हम आते थे, तब वह ताजे हालात पर तस्करा करते थे।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के तालीमे इल्म रहने तथा मुसलमान होने के बावजूद उनके, दौस्ताना ताल्लुकात गै़र मुस्लिमों में ज़्यादा थे। एक बार पुरानी दिल्ली के ‘चारदीवारी’ सपील के इलाके में हिंदू-मुस्लिम दंगे के कारण कर्फ्यू लग गया। मैं मुजीब को उनके घर से बुलाकर अपने मौरिस नगर वाले घर में रहने के लिए लिवा लाया। उनके मन में कोई कड़वाहट नहीं थी। उन्होंने जाहिल जैहनियत के हिंदू मुसलमान दोनों को बराबर कोसा। पता चलने पर उनके कई हिंदू दोस्त उन्हें अपने घर ले जाने के लिए मेरे घर आये।
साथी सुधीर गोयल एक बार सख्त बीमार पड़ गये। मुजीब को जब पता चला तो उन्होंने बिना बताये अमरोहा (उत्तर प्रदेश) के एक हकीम साहब को अपने भांजे की कार में सुधीर के घर यह भरोसा दिलवाते हुए नोएडा भिजवाया कि ये हकीम साहब शर्तियां इलाज कर देंगे।
आज जब हिंदुस्तान की सियासत हिंदू-मुस्लिम फसाद, अलगाव तथा मुल्क परस्ती के सर्टिफिकेट बाँटने पर चलाने की कोशिश हो रही है तो सैक्यूलर जहनियत के पक्के हिंदुस्तानी गंगा-जमुनी तहज़ीब में पले रचे-बसे, साथी मुजीब की तस्वीर आँखों के सामने खड़ी हो जाती है। मुजीब की याद मिटाये से भी मिट नहीं सकती।




