दो टूक : अर्थ व्यवस्था घाटे में है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
राजनीति का पहिया उलझा,
ईसा अल्ला राधे में है।
सात दशक बीते पर अपनी,
अर्थ व्यवस्था घाटे में है।
अपने पास रहे हैं नेहरू,
मनमोहन नरसिंह राव भी।
सात साल से देश पा रहा,
मोदी जी का सबल छांव भी।
फिर भी देश का हीरा मोती,
कुछ सेठों के खाते में है।
सात दशक बीते पर अपनी,
अर्थ व्यवस्था घाटे में है।
रोज बनाए नई योजना,
रोज रहे कानून जागते।
रोज रोज आगे बढ़ने को,
नेता अफसर रहे हांफते।
फिर भी भूख दहाड़ रही है,
कर्जा बन्द लिफाफे में है।
सात दशक बीते पर अपनी,
अर्थ व्यवस्था घाटे में है।
ऐसा नहीं कि कंगाली है,
अपुन देश में भी लाली है।
सिस्टम जी के घर में देखो,
केवल दिखती हरियाली है।
इसके बाद बचा जो जूठन,
सब नेता के हाते में है।
सात दशक बीते पर अपनी,
अर्थ व्यवस्था घाटे में है।
फिर भी कोई हँस लेता तो,
विस्मय होता कौन हंसा है।
सिस्टम बतलाता शासन को,
हमसे खुश हो मौन हँसा है।
समझाता है कमी नहीं है,
अभी रसोईं साझे में है।
सात दशक बीते पर अपनी,
अर्थ व्यवस्था घाटे में है।
पहले चुनरी में धब्बा था,
अब धब्बे की ही चुनरी है।
पहले थे गिनती के दागी,
अब दागी की ही गठरी है।
पहले दाग रहा कपड़े पर,
अब वह भीतर माथे में है।
सात दशक बीते पर अपनी,
अर्थ व्यवस्था घाटे में है।
दूर दूर तक रात अंधेरी,
दूर दूर तक नहीं है राहत।
इसे बदलने की अकुलाहट,
या इसमें मरने की चाहत।
दोनों जन की इच्छा में है,
दोनों जन के चाटे में है।
सात दशक बीते पर अपनी,
अर्थ व्यवस्था घाटे है।
– धीरु भाई ( धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव )



