धरा की वेदना

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
धरा के दर्द की वेदना
प्राकृतिक आपदाओं
संग चित्कार रही है।।
मानव जान कर भी सब
किस कदर अनजान बन रहा
यही धरा देख रोके सच इंसा
तुझे समझा पुकार रही है।।
इतना कुछ देती तुम्हें निस्वार्थ
फिर प्रकृति पर संहार क्या सही है?
खोल आंखें देख दर्द धरा का इंसा
आज ये धरा तुम्हें धुतकार रही है।।
में धरा देख रही हूँ सब
बस बेबस मजबूर सी हो
क्या हाल कर दिया तुमने
ओ मानव तुंम कब सुधरोगे
कंकरीट का शहर बसा दिया
हर जगह उजाड़ दिये पेड़ पौधे
जंगल के जंगल नष्ट किये तूने
अपने स्वार्थ में अंधे होकर के
विकास तूने बहुत किया पर
मेरा बुरा हाल किया पहाड़
के पहाड़ गायब कर दिये
प्रकति का संतुलन बिगड़ दिया
अभी भी समय है रोक ले
अपने आपको थाम ले हाथों को,
प्रकति से मत खिलवाड़ कर
सजा भुगतनी होगी भारी
प्राण वायु घट रही जंगल ही
नही बचे तो होगी कैसे ऑक्सीजन
प्राण वायु कितनी महँगी बिक रही
अब भी वक्त है सम्भल जा तू।
धरा की आँखों मे छुपा दर्द दिखा न किसी को
बेबसी में घिरा मन दिखा न किसी को
खुद पर देखर शराब की बोतल
खुद को ही कोसा
इन दर्द ए आँखों से झाँकता ये
गम़ दिखा न किसी को
कहते शायर धरा पर शब्दो को तोलते है
करार दिया आज मेरी दर्द एक्षबेखुदी को
आँखों से बहता जहर दिखा न किसी को ।
रात की तन्हाई सताती है
जब जब याद आपकी आती है
अश्कों से दरिया बहने लगता है
जब आपसे दूर होने ख्याल मन में आता है
दर्द ने दर्द को सुना
तो दर्द को दर्द हुआ।
कहने को अब बचा ही क्या
सुना कि दर्द उनको हुआ।
अश्रुवन जल झरे,धरा की वेदना दीखे चहुँ ओर,
बिलख रहा प्राणी , दिन -रात, साँझ या भोर,
चीत्कार , हाहाकर की सकल उठ रही शोर,
प्रकृति की मुकम्मल सज़ा ,खींची सबकी डोर।
वेदना से धरा सिसक रही, उठाए असीमित भार,
स्वछंद पवन,कुंठित-कलुषित ,हुआ गुणा हज़ार,
निर्मल ,निरीह-निर्दोष,पशु-पक्षी, छोड़ रहे संसार,
स्वच्छ गगन हो रही दूषित ,आँसू झर रहे अपार ।
रो रही आँखें अग्नि की , लाशें फूँकते बारंबार,
अश्रुपूर्ण , बेबस इंसान छोड़ रहे , जग परिवार,
नन्हा शिशु भी ,सुन रहा कोख में ,आहत चीत्कार,
प्रश्न सहित आँसू की क़ीमत , पूछ रहा बारम्बार।
अंसुअन जल न गिरती ,जब वृक्ष न काटते हज़ार,
बिना दाहकर्म के,मृतक न सिसकते,बहते जलधार,
जीव जगत के जीव- मात्र ,न सिसकते यूँ लाचार,
माता-पिता , भाई-बहन पराश्रित न होते लगातार।
आँसू न झरते , गाड़ियाँ ज़हरीली धुएँ न उगलती,
कचरे का अंबार बेवजह , यहाँ-वहाँ न बिखरता,
दो गज़ की दूरी सहित मास्क , दिल्लागी न लगती,
अनावश्यक भंडारण,दवा-ऑक्सिजन का न होता ।
संभल प्राणी,रोक धरा की वेदना,थोड़ा वक़्त शेष है,
ईश्वर,अल्लाह,यीशु या हे दाता,तेरा रहम विशेष है।
विराट सखियां
वीना आडवानी तन्वी
नागपुर, महाराष्ट्र




