कला-साहित्यविचार

“नशा”

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

धीरे-धीरे बना जहर, मानव को डसता जाता है|
यह नशा बना अभिशाप, जीवन को निगलता जाता हैI
जब ले लेता आगोश में ये ,कुछ होश रहा ना जीवन का|
भूली सारी जिम्मेदारी, करता विनाश यह तन मन का|
यह नशा क्षीण करता जीवन, घर को करता है कलह पूर्ण |
दीमक के जैसे लकड़ी को ,करता जाता पल-पल छिन छिन|
घून के जैसे लग जाए तो, कर दे जीवन को नष्ट भ्रष्ट|
चहूं ओर कराए बदनामी, कर देता है यह पथभ्रष्ट|
जिसको लग गई है लत गंदी, उसको समाज का भय ना रहा |
नाली में गिरे या सड़कों पर, मरने जीने का डर ना रहा|
लेकर आगोश में युवा वर्ग को, पतन की राहें दिखा रहा|
जो करते घर को कलहपूर्ण, मदिरालय को जो सजा रहा |
“रीत” कहे सुन युवा वर्ग, सद् बुद्धि लाओ जीवन में I
ना नशा को हावी होने दो, करो तिरस्कार इसे जीवन में I

लेखिका/ रचनाकार:
रीता तिवारी “रीत”
संप्रति :अध्यापिका ,स्वतंत्र लेखिका एवं कवयित्री
शिक्षा :एमए समाजशास्त्र ,बीएड ,सीटीईटी उत्तीर्ण
मऊ ,उत्तर प्रदेश से

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