कला-साहित्य

पितृमोक्ष का आशा है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

नन्ही अंजली  कुश तिल और जल तर्पण का देते अर्घ ।

हृदयविदारक करुण घटना है पितृ तर्पण का देते अर्घ।।

हे पिता उपकार तुम्हारे मूर्त रूप करने को तैयार।

इस नन्ही हाथों में समर्थ कहाँ उतारने आपका उपकार??

क्या तिल जल और मुखाग्नि तक का था बस  अपका हमारा साथ।

मेरे छोटे पॉव जमीन पर ठीक से टिके भी

नहीं अभी अपने आप।।

चलना भी तो नहीं सीख है छोड़ गए इस बीच मजधार।

अनुभव हीन और अनभिज्ञ हूँ कैसे करूँ ये नाव पार ।।

इस जीवन के उतार चढ़ाव में  होगा कौन सहायक मात्र।

अनाथ और बेसहारा मैं  किससे जाकर करूँ गुहार।।

क्षत्र पिता का सर से गायब विकल खड़ा अब मैं अबोध।

किसकी उँगली किसकी गोदी जाकर बैठु मैं अबोध ??

क्या जल्दी थी परलोक गमन को क्या गहरा है राज बड़ा?

मुझे क्या कारना इन सबसे मेरे साथ हुआ अन्याय बड़ा।।

सुनते हैं एक जगत पिता हैं जिसके बस में पूरा संसार।

क्या उनको भी दया नहीं इस अबोध से छीना पिता का साथ।।

अब तो बस ये नन्ही अंजली  और ये नन्हा सा काया है।

आंखों में बस अश्रु बून्द और पितृमोक्ष का आशा है।।

पर अंदर में ह्रदय हिंडोले मन विह्वल और सन्ताप।

पितु मिलन की आशा मन में फिर भी कर रहा उनका श्राद्ध।।

श्री कमलेश झा

भागलपुर

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