कला-साहित्य
पिया मिलन

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
चूड़ी कंगन महका गजरा
धड़कन धड़कन ठहराव है
सिमट रही हूं घुंघट में पर
बिखरे सब जज्बात हैं।
मन अधीर बेचैन है आंखें
तन भी खुद में सिमट रहा
हर आहट एहसास तुम्हारा
जाने कैसे ख्वाब हैं।
आंखों के काजल का पहरा
कंगन बढ़चढ़ शोर करे
झुमका पायल सब भरमाये
पिया मिलन की रात है।
मौन अधर आंखें हैं मुखर
पिय ने थामा हाथ जब
बंद कली छूने से तुम्हारे
खिलने को बेताब है।
उनका छूना अंक में भरना
तन मन जैसे निखर गया
धूप खिला दी चांद से मुख पर
उनकी सब सौगात है।
सिमट रही हूं घुंघट में
पर बिखरे जज्बात हैं।
मोहिन गुप्ता,
हैदराबाद तेलंगाना




