कला-साहित्यविचार
बहारें फिर भी आती है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
मेरी वफ़ाओं की थोड़ी तो,
आबरु रखना ।
तर्के ताल्लुक ही सही , हमें,
याद ही करना ।
ये ज़माना है दरमियां दरारें,
तो करेगा पैदा ।
शिकवा भी हो , ला करके,
मेरे रुबरु रखना ।
क़फ़स में भी कभी धोखे से,
आ जाओ तो ।
आस्मानों में उड़ने का तुम ,
होसला रखना ।
मौसम बहारों का चला भी,
गया ग़म कैसा ।
बहारें फिर भीआती है ,दिल में,
यकीं रखना ।
सारी दुनियां पे लुटा दे तु ,
मुहब्बत अपनी ।
मेरा हिस्सा मुश्ताक थोड़ा,
तो बचा के रखना ।
डॉ.मुश्ताक अहमद शाह ”
सहज ” – हरदा मध्यप्रदेश




