कला-साहित्यविचार

बैसाखी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

झूमती गाती आई बैसाखी , फसलों की बहार लाई वैसाखी ।
लहराए खेतों में सोना , जिसे देख किसान के मन का महके कोना -कोना ।
धानी चुनर में जैसे मोती सजे , ढोल – ताशे और बाजे बजे ।
वीणा सा झंकृत हो मन बार-बार , किसान की आंखों में सपने सजे हज़ार ।
साजन लाया सोने का हार , क्यों ना पहनाऊं उसे बांहों के हार ।
गुरु गोविंद सिंह जी ने धार्मिक पंथ की कर स्थापना मनाई वैसाखी ।
गंगा भी इसी दिन हुई अवतरित , गंगा स्नान कराएं वैसाखी ।
सब के लिए नया सम्मत , नया साल लाए वैसाखी , ना कोई
हिन्दु , ना मुस्लिम, ना सिख ,ना ईसाई , सबको एक बनाए वैसाखी ।
सुंदरम करें प्रवेश मेष राशि में इसलिए मेष – संक्रांति भी कहाए वैसाखी।

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

 

 

 

 

 

 

 

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