राष्ट्रवादी हिंदी संस्कार है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
हिंदी भाषा नहीं, संस्कार है
हिंदी बोली नहीं, चमत्कार है
अपने आप पर आ जाए तो
हिंदी संवाद नहीं ललकार है।
सरहदों के पार पहुंचने वाली
हमारे मुख्य धरोहर की भाषा
हिंदी दिलों की दूरियां मिटाती
अखंड भारत का संदेश देती है।
हिंदी रगों में रुधिर बन बहती है
यह वेद और पुराण की भाषा है
सहज सरल सुगम मधुर भाषा
भारतीयों के प्राणों में बसती है।
हिंदी बिना जिंदगी सुनी, अधूरी
यह हर हिंदुस्तानी की बंदगी है
एकता, भाईचारे का पाठ देकर
उदासी में ठिठौली, दिल्लगी है।
हिंदी साहित्य ने जन-जागरण से
देश प्रेम व जागृति जगा रखी है
शोषण अत्याचार से मुक्ति दिला
दायित्वों के प्रति सजग करती है।
साहित्य व समाज का दर्पण बन
जनमानस की आत्मा मैं बसी हुई
रोम रोम में बसे कला के सृजन से
जीवन के सपने सारे पूरे करती है।
हिंदी राजभाषा नहीं राष्ट्रभाषा हो
भारत का गर्व से परचम फहराती
गुजर बसर के साधन संसाधन से
बेसहारों को रोज़गार भी देती है।
हिंदी सफलता की परिचायक बन
हिंदी हमारी अभिभावक होती है
हिंदी से हम काम के लायक बनते
ये हमारी राष्ट्रवादी नायक होती है।
डॉ. मनीष दवे, महालक्ष्मी नगर, इंदौर




