श्रमिकों के दोहे

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
श्रमसीकर नित पूज्य हों,पायें अति सम्मान।
श्रम से ही धनधान्य है,श्रम से ही उत्थान।।
श्रम से ही ऊँचे भवन,श्रम से ही है कोष।
श्रमजीवी भूखा अगर,बोलो किसका दोष।।
श्रम से सारे खेत हैं,श्रम से ही उद्योग।
श्रम से ही आता सदा,उच्च अर्थ का योग।।
श्रम से ही हैंं पटरियाँ,सड़कें,नहरें,यान।
रेलें,कारें और ट्रक,राष्ट्रप्रगति का मान।।
श्रम दिखता खलिहान में,बन रक्षा-आधार।
स्वेद बहे नियमित जहां,बनकर के रसधार।।
श्रमसीकर ही नींव हैं,जिनसे बनता देश।
श्रमसीकर ही नित हरें,सतत् वतन का क्लेश।।
श्रमसीकर पायें सदा,श्रम का पूरा मोल।
लोकतंत्र में लोकहित,के भीतर है पोल।।
श्रमिक दिवस इक चेतना,एक प्रखर आवाज़।
बिना श्रमिक के है नहीं,किंचित सुर अरु साज़।।
श्रमिक दिवस इक गान है,है यश का सामान।
आओ हम ‘मजदूर’ का,करें ह्रृदय से मान ।।
सारी दुनिया में मने,मजदूरों का पर्व।
जिस पर हम सब मिल करें,नित ही बेहद गर्व
प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे
प्राचार्य
शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय
मंडला,मप्र–481661
(मो.9425484382)




