आलेख

हमारे बच्चे, हमारी ज़िम्मेदारी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

बच्चों का दिमाग बड़ों की अपेक्षा अधिक तेज़ समझा जाता है अर्थात् किसी भी चीज को समझने में जितना समय हम बड़े परिपक्व लोग लेते हैं, बच्चे आधे समय में वह बात समझ लेते हैं।जी हां, बच्चों की सोचने समझने की शक्ति बड़ों की अपेक्षा ज्यादा होती है।वजह कोई भी हो सकती है,जैसे बच्चों के दिमाग पर जिम्मेदारियों का बोझ बड़ों की अपेक्षा में बहुत कम होता है,बच्चों की बढ़ती उम्र में उनके मानसिक और बौद्धिक विकास का क्रम निरंतर चल रहा होता है।ज्यादा काम करने पर भी उनको थकान कम ही महसूस होती है और हर काम को करने का उनका अपना एक अनोखा तरीका भी होता है जो बड़ों से थोड़ा हटकर भी होता है।

जिस प्रकार बच्चे बड़ों की अपेक्षा अधिक तीव्रता से काम करने का सामर्थ्य रखते हैं,ठीक उसी प्रकार किसी भी घटित घटना का असर भी बच्चों पर ही सबसे पहले और अधिक पड़ता है,फिर वो असर चाहे नकारात्मक हो अथवा सकारात्मक। नि:संदेह आजकल के बच्चे हर बात की तह में जाकर ही सही गलत का फैसला करते हैं,परंतु सामयिक परिवेश बच्चों और ख़ासतौर पर युवा पीढ़ी को बहुत अधिक प्रभावित करता है।

बात कोरोना काल में बच्चों पर पड़ने वाले प्रभावों की करें तो अधिकतर लोगों के मस्तिष्क में सबसे पहले इसके दुष्प्रभाव ही आते हैं।बात सही भी है,बेशक कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने बच्चों के विकास और वृद्धि को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है।उनका हंसता खेलता बचपन मानों कहीं गुम ही हो गया है। बच्चे घर से बाहर निकल नहीं पाते,एक दूसरे से संपर्क नहीं कर पाते,समाज में होने वाली विविध प्रकार की गतिविधियों से रूबरू नहीं हो पाते,अपने दोस्तों, रिश्तेदारों,पड़ोसियों और नातेदारों के सुख दुख में सम्मिलित नहीं हो पाते,जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनके मानसिक,शारीरिक और सामाजिक विकास पर पड़ रहा है। व्यायाम,कसरत,जोगिंगऔर चहलकदमी न कर पाने के कारण बच्चों को अनेक प्रकार की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जिसका सीधा संबंध उनके मानसिक विकास से भी है क्योंकि एक स्वस्थ शरीर में ही तो एक स्वस्थ मस्तिष्क का निवास और विकास होता है।बच्चों को अनेक प्रकार की शारीरिक परेशानियों यथा,शरीर में अकड़न,रक्त संचार में कम प्रवाह,सुस्ती और चिड़चिड़ापन इत्यादि का सामना भी करना पड़ रहा है।

बात अगर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की करें तो कोरोना ने कोई कसर नहीं छोड़ी है मानसिक विकास को अवरुद्ध करने में भी।हर वक्त घर में कैद रहने की वजह से बच्चों का समय व्यतीत नहीं हो पाता,ऑनलाइन पढ़ाई करने के बाद भी उनके पास इतना समय बचता है जिसको घर में रहकर बिताना उन्हें कठिन लगता है और मोबाइल फोन पर चैटिंग,गोसिपिंग और गेम खेलने के अलावा उनके पास कोई चारा ही नहीं बचता।हर घर में यही सब देखने को मिलता है,बच्चों के हाथ में हर समय अपना पर्सनल मोबाइल फोन होता है।स्क्रीन पर लंबे समय तक देखते रहने से उनकी नेत्र ज्योति भी लगातार कम होती जा रही है और उन्हें अनेक प्रकार के नेत्र रोगों को भी झेलना पड़ रहा है।मोबाइल से कुछ मिनटों की दूरी भी आज की पीढ़ी के बच्चों से बर्दाश्त नहीं होती जिसके चलते वे कभी कभी अपने संस्कार तक को ताक पर रख अपने बड़ों से उलझने को तैयार हो जाते हैं।मोबाइल में बच्चे क्या कंटेंट देख रहे हैं,उस पर अभिभावक निगरानी भी रखते हैं परंतु हर समय चौकस रह बच्चों पर निगरानी रखने से बच्चों और अभिभावकों के बीच रिश्तों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है,उनके बीच आपसी विश्वास कम होता जा रहा है और जिसके चलते संवेदनाओं का भी ह्रास हो रहा है।

मोबाइल फोन का प्रयोग तो बच्चे कोरोना काल से पहले भी करते थे,परंतु इतना अधिक नहीं, क्योंकि आधा दिन तो बच्चों का स्कूल में ही निकल जाता था और कुछ समय कोचिंग,ट्यूशन आदि में।खैर,जो भी हो,ये निर्विवाद रूप से सत्य है कि कोरोना महामारी के चलते देश के भावी कर्णधारों को बहुत सी दिक्कतों से गुजरना पड़ रहा है।

ऐसे में,सबसे बड़ी जिम्मेदारी हम अभिभावकों की बनती है कि हम अपने बच्चों को कोरोना के दुष्प्रभावों से जितना हो सकें बचाएं।अपने कामों से फ्री होकर अपने बच्चों के साथ समय व्यतीत कीजिए,उनके साथ हंसिए,उनको सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करें और उन्हें हर मुश्किल परिस्थिति का हिम्मत से सामना करने का हौंसला दें। बच्चों के लिए बनाए गए नियमों के साथ साथ कुछ नियम अपने और घर के सभी अन्य सदस्यों के लिए भी बनाएं और सख्ती से उनका पालन भी करें कराएं क्योंकि आप ही अपने बच्चों के आदर्श हैं।

पिंकी सिंघल
अध्यापिका
शालीमार बाग
दिल्ली

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