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परमानंद मिलता है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

ना है उत्पत्ति ना ही अंत

यह शाश्वत स्वयं में अनंत।

यह कहीं तुझमें खिलता है

तुझसे सभी को मिलता है।

आत्मा के दीप का प्रकाश

प्रेम पूर्ण धरा-आकाश।

प्रेम दीप यूँ नहीं जलता

यह प्रसाद यूँ नहीं मिलता।

जब यह मन हो आनंद में

रसना भी शांत विराम में।

जब अहम ‘हम’ में बदल जाए

जीवन का भ्रम टूट जाए।

अनुराग की भावना व्याप्त

अपना-पराया भाव समाप्त।

जब ध्येय समाप्त अर्जन का

स्व समर्पण,मन विसर्जन का।

तब कहीं प्रेम कमल खिलता

तब परमानंद मिलता है।।

अंजनी द्विवेदी 

देवरिया ,उत्तर प्रदेश

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