अर्द्धांगिनी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
मान है सम्मान है,पति के लिए वह प्राण है
सुलक्षण से सिक्त पत्नी,ईश का वरदान है
है कभी अर्द्धांगिनी सहधर्मिणी सहचरी वो
धर्मपत्नी कहाती है,सर्वदा सुख करी वो
पहर आठो वही,अपने कंत की मुस्कान है
सेतु है ससुराल में,रिश्तों को रखती बांध के
रखे हर संबंध को,सेवा से अपनी,साध के
पति के गौरव के लिए,पत्नी सदा सह गान है
पत्नी,पति के लिए हरपल सांस है विश्वास है
सगिंनी विपदा में वह, उत्साह का अनुप्रास है
सुशीला पत्नी बिना लगता कि पति निष्प्राण है
पराकाष्ठा प्रेम की वह, नेह की ,ऊंचाइयां
छांह पीपल की घनी,मंजर भरी अमराईंयां
मधु मिश्रित बोल वाली, पत्नी कोयलतान है
सर्व, मंगल मांगलेय और कल्याणी सदा
मातृ रूपे है वही ,ममता मयी वाणी सदा
पति के जीवन में वही,उत्कर्ष का दिनमान है
वह निराशा में है आशा,भोर का विश्वास है
प्रतिकूलता में भी वह उत्साह मय उल्लास है
नारी ‘पत्नी’ रूप में सभ्यता की, गुनगान है।
त्याग,सेवा,क्षमा ही उसकी सहज पहचान है।
— डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना
बेतिया, पश्चिम चंपारण, बिहार




