सम्पादकीय

‘इंडिया’ बनाम ‘एनडीए’

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

2024 के लोकसभा चुनावों का बिगुल अब बेंगलुरू में देश के 26 विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ ( इंडियन नेशनल डेवलेपमेंटल इन्क्लूसिव एलांयस) अर्थात भारतीय राष्ट्रीय विकासशील समावेशी गठबन्धन की बैठक होने के जवाब में नई दिल्ली में 38 दलों के ‘एनडीए’ या राष्ट्रवादी लोकतान्त्रिक गठबन्धन की बैठक के साथ बज चुका है। ‘एनडीए’ भाजपा के नेतृत्व में केन्द्र में सत्तारूढ़ गठबन्धन कहलाता है जिसमें हाल ही में नये छोटे- छोटे दलों को शामिल करके इसकी संख्या 38 तक पहुंची है जबकि ‘इंडिया’ गठबन्धन में प्रमुख विपक्षी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के अलावा अन्य सभी प्रमुख क्षेत्रीय दल हैं।

मगर इन दोनों गठबन्धनों के अलावा कुछ ऐसे और क्षेत्रीय दल भी हैं जो अपने- अपने राज्यों में सत्तारूढ़ होने के बावजूद किसी भी गठबन्धन में शामिल नहीं हुए हैं। इसमें आन्ध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस, ओडिशा की बीजू जनता दल व तेलंगाना की भारत राष्ट्रीय समिति प्रमुख हैं। इन तीनों दलों को इनका पिछला संसदीय रिकार्ड देखते हुए विपक्ष की राजनीति का हिस्सा नहीं माना जा सकता है क्योंकि संसद में इन दलों के सांसदों ने हमेशा आड़े वक्त पर मोदी सरकार का समर्थन करने को वरीयता दी है। अतः सत्ता पक्ष और विपक्ष के अलावा ऐसे दलों को यदि ‘सपक्ष’ कहा जाये ये तो कुछ गलत नहीं होगा।

ये दल अपने-अपने राज्यों में विधानसभा स्तर पर मजबूत जरूर हैं मगर 2024 की सीधी लड़ाई को देखते हुए इनके  हाशिये पर रहने का जरूर अन्दाजा लगाया जा सकता है क्योंकि राजनीति के तेवर देखते हुए लोकसभा चुनाव के मुद्दे सीधे भारत की जनता के साझा मुद्दे ही हो सकते हैं। मगर हमंे यह ध्यान रखना होगा कि लड़ाई बेशक ‘इंडिया’ गठबंधन  व ‘एनडीए’ के बीच ही दिखाई जाये मगर असली मुकाबला अन्ततः कांग्रेस पार्टी व भाजपा के बीच ही होगा क्योंकि दोनों गठबन्धनों में केवल ये दो पार्टियां ही हैं जिन्हें विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय पार्टी कहा जा सकता है। मगर इन दोनों पार्टियों के साथ एक विडम्बना यह है कि जहां भाजपा विन्ध्याचल पर्वत के पार दक्षिणी भारत में बहुत कमजोर है वहीं कांग्रेस उत्तर भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में हाशिये पर खिसक चुकी है।

उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं जबकि दक्षिण भारत के पांच प्रमुख राज्यों कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल व तमिलनाडु में लगभग सवा सौ सीटें हैं। अतः 2024 की लड़ाई बहुत दिलचस्प होने जा रही है मगर एक बात तय है कि राजनैतिक दलों द्वारा इन चुनावों के प्रचार में सार्वजनिक बयानों के स्तर को चाहे जितना भी नीचे गिराया जाये परन्तु सार्वजनिक जन विमर्श अन्ततः सैद्धान्तिक मुद्दों पर ही बने रहने की उम्मीद है क्योंकि विपक्षी गठबन्धन ने जिस तरह अपना नाम इस देश के ‘अंग्रेजी’ नाम इंडिया पर रखा है उससे आम मतदाता की राजनीतिज्ञों से ऊंचा व्यवहार व आचरण करने की अपेक्षाएं बढ़ जायेंगी।

मैंने कल ही लिखा था कि 2024 के चुनाव साधारण लोकसभा चुनाव नहीं होंगे और अगली पीढिघ्यों की किस्मत तय करने वाले होंगे तथा बदलते वैश्विक घटनाक्रम में भारत की दशा तय करने वाले होंगे। अतः सत्तारूढ़ गठबन्धन ने भी आज प्रधानमन्त्री नेतृत्व में अपनी बैठक करके साफ कर दिया है कि उसके निशाने पर विपक्षी गठबन्धन का विमर्श ही रहेगा जिससे वह अपना विमर्श जनता में लोकप्रिय बना सके परन्तु लोकतन्त्र में असल विमर्श वही होता है।

जिसे आम जनता स्वीकार करती है क्योंकि वही लोकतन्त्र की असली मालिक होती है और देश के संविधान पर उसे पूरा भरोसा होता है और वह मानती है कि भारत में जो भी होगा वह संविधान की कसौटी पर खरा उतरने वाला ही होगा। अतः विपक्षी गठबन्धन इन चुनावों में संविधान का मुद्दा जिस तरह उठा रहा है और लोक कल्याणकारी राज की आवाजें जिस तरह जनता के बीच ही गूंज रही हैं, वह भी देखने वाली बात होगी। इस सम्बन्ध में हमें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि भारत के संविधान को भारत के लोगों ने ही अपने ऊपर लागू करने की 26 जनवरी, 1950 को कसम खाई थी।

जिसमें सामाजिक असमनता से आर्थिक विषमता दूर करने के लिए सरकारों को विशेषाधिकार दिये गये थे और प्रत्येक व्यक्ति के निजी सम्मान व गौरव की गारंटी दी गई थी। चुनावों के माध्यम से हर पांच वर्ष बाद देश की जनता अपने  इन्हीं अधिकारों को पुनर्स्थापित करती है और ऐलान करती है कि भारत ऐसा देश है जिसमें आम आदमी की सत्ता में सीधी भागीदारी उसके चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से होती है। इसीलिए लोकतन्त्र में संसद में बहुमत के आधार पर चुनी गई विशेष राजनैतिक दल की सरकार शपथ लेते ही हर उस मतदाता की सरकार भी हो जाती है।

जिसने बहुमत वाले राजनैतिक दल के खिलाफ चुनावों में वोट दिया होता है। यही वजह कि अल्पमत में रहने वाले विपक्षी दलों की संसद के माध्यम से सत्ता में भागीदारी करने की व्यवस्था हमारी संसदीय प्रणाली में है। संसद में सत्ता और विपक्ष के सदस्यों के बीच गरमागरम या जोरदार बहसें अकारण ही नहीं होती बल्कि उनसे तय होता है कि सत्ता पक्ष में बैठे दल की नीतियों में जरूरत पड़ने पर जनता के हित में  संशोधन किया जा सके। इसीलिए लोकतन्त्र को लोकसंवाद की प्रणाली भी कहा जाता है।

संसदीय प्रणाली को स्थापित करने वाले हमारे दूरदृष्टा पुरखे हमें यही समझा कर गये हैं कि लोकतन्त्र में गठित सरकार मालिक जनता की सेवा करने के लिए होती है जिसे हर पांच साल बाद जनता ही उसे उसकी मेहनत का मेहनताना देती है। अतः सभी राजनैतिक दलों की पुरजोर कोशिश होनी चाहिए कि चुनावी जन-विमर्श केवल आरोप-प्रत्यारोप का प्रदर्शन होकर न रह जाये बल्कि संसद से लेकर सड़क तक सार्थक विषयों का पुलिन्दा हो।

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