कला-साहित्यविचार

इसके घर भिजवा दे

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

पति ने कहा मैं

बहुत खूबसूरत हूँ

मैं खुश होकर

तुरंत ही मान गई।

सास ने कहा मैं

बहुत मासूम हूँ

मैं भोली बनी

तुरंत ही मान गई।

लाल बिंदी सजती

है मुझ पर

मैंने तुरंत सजा लिया।

लाज स्त्री का गहना है

मैंने घूँघट ओढ़ लिया।

मेहँदी, बिछुए

कंगन पायल

पहन मेरा मन

नाच उठा।

खुशी-खुशी घर की लाज को

अपने हाथों में ले लिया।

ससुर ने कहाँ मैं

धुरी हूँ घर की

मैंने स्वयं को गड़ लिया।

धीरे-धीरे मैंने

अपना सब कुछ

न्यौछावर कर दिया।

नव घर की रचना में अपना

प्राण-प्रण भी लगा दिया।

अचंभित तो तब हुई

जब मैंने कानों से सुन लिया

बीमार हुई हैं तो इसको

इसके घर भिजवा दे……?

क्यों स्त्री का कोई घर नही होता?

अप्रकाशित मौलिक रचना

सर्वाधिकार सुरक्षित

कवयित्री: -गरिमा राकेश गौत्तम

पता:-कोटा राजस्थान

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