कला-साहित्य
कविताओं की असल जगह
युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
नहीं चाहूंगी कि “कविताएं”
दिखें सिर्फ किताबों में ही ,
बल्कि
उनकी असल जगह
स्कूल के प्रांगणों में
बजती हुई करतल ध्वनियों के बीच होगी ,
मैंने ,आज ही उसे देखा
क्लास में
पीछे की बैंचों पर बतियाते हुए
बिल्कुल बेफिक्री से ,
घिसे-पिटे काले-पुते बोर्ड पर भी
टुकड़े-टुकड़े चाक से
अ आ इ ई,,,उ ऊ,,,, में
रची जा रही थी
एक सुंदर कविता,
भारी भरकम सिलेबस,,
बढ़ती हुई फीस,,
कैरियर की टेंशन से दूर
रेसिस के समय,,
वह खेल रही थी,,सहेलियों के संग
आइस-पाइस ,
छुट्टी की घंटी बजते ही
आ पसरी यकायक
सबके चेहरों पर,,अजब मुस्कान बनकर ,
और,,
बस्तों को समेटकर
चल दी,,घर की ओर !!
नमिता गुप्ता “मनसी”
मेरठ , उत्तर प्रदेश




