कला-साहित्य

खामोशियां बोलती हैं

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

यह सच है कि तुम बोलते कुछ नहीं
बस तुम्हारी खामोशियां बोल जाती हैं
सामने आते हो मेरे जब भी कभी
होंठों पे हल्की सी मुस्कान खेल जाती है।

मन में चलता है तुम्हारे द्वंद कि क्या करें
किस तरीके से बात हम तक पहुंचाएं
फिर इस चिंता में जज्ब करते हो खुद को
कि कहीं बात जमाने में न खुल जाए।

और इधर मैं कहता हूं कि तांडव अगर
होना है तो आज, इसी वक्त हो जाए
छिन्न- भिन्न हों सृष्टि के सारे कायदे
प्रलय में भी प्रेम की फसल लहलहाए।

जितेन्द्र ‘कबीर’

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