कला-साहित्य

गुब्बारे वाला

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

मैं एक बच्चा हूं,
गुब्बारे लाया हूं,
आंखों में सपने लिए,
मैं गुब्बारे बेचता हूं।

मैं भूखा रहता हूं,
मेरी मां भी भूखी है,
घर में छोटी बहना,
दिन रात वो रोती है,
ये गुब्बारे बेच यहाँ,
चूल्हा जलाने आया हूं,
मैं एक बच्चा हूं,
गुब्बारे लाया हूं।

कैसी ये दुनिया है,
कितना है अंतर यहां,
कोई आसमान को छू ले,
कोई गुब्बारे बेचे यहां,
ले लो ये गुब्बारे,
ले अरमान मैं आया हूं,
मैं एक बच्चा हूं,
गुब्बारे लाया हूं।

दिन का पता नहीं,
हर पल है अंधेरा यहां,
घर में तेल नहीं,
कैसे हो प्रकाश यहां,
शायद गुब्बारे बेच,
जल जाए एक दीया,
आंखों में आंसू लिए,
गुब्बारे बेचता हूं
मैं एक बच्चा हूं,
गुब्बारे लाया हूं।

मैं भी पंख लगा कर,
उड़ना यहां चाहता हूं,
गुब्बारे बेचकर ही,
कुछ पाना चाहता हूं,
ले लो ये गुब्बारे,
पंख लगाना चाहता हूं,
मैं तो बच्चा हूं,
गुब्बारे लाया हूं,
आंखों में सपने लिए,
मैं गुब्बारे बेचता हूं।

स्वरचित अनामिका मिश्रा
झारखंड सरायकेला जमशेदपुर

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