कला-साहित्य

चाँदनी रात थी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

नैन की नैन से वो, मुलाकात थी,

झुक गये थे नयन,चाँदनी रात थी।

प्यार के फूल यूं,दिल में खिलने लगे,

मैं महकमे लगी, जैसे बागात थी।

मैं न हिन्दू रही, तू न मोमिन रहा,

दोनों के बीच में, प्यार की जात थी।

खुशनुमा शाम थी,हाथ में हाथ था,

थी बढ़ी धड़कने,प्रेम बरसात थी।

वो असर था कि मग़रिब,मुझे क्या पता,

तू खुदा लग रहा था,अजब बात थी।

फिर हुआ क्या तुझे,क्यों है रूठा हुआ,

यूँ तेरा रूठ जाना,मेरी मात थी।

प्यार की राह में,चल के रुसवा हुए,

दी जमाने ने हमको, हिदायत थी।

प्रेम तुमको मिले, तुम न तन्हा रहो,

बस यही मेरी रब से, इबादात थी।

बेवफा मैं नहीं,कर ‘किरण’ का यकीं,

थी नसीबों की कुछ, वक्त की घात थी।

प्रमिला ‘किरण’,इटारसी-मध्य प्रदेश

दूरभाष-7000290983

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