चार सौ बीस “श्री”
युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
आज मैं सन 1955 में प्रदर्शित फिल्म श्री ४२० का यह गाना सुन रहा था।
इस गाने की शब्द रचना में पहेलियां हैं। इसे लिखा है, गीतकार शैलेन्द्रजी ने।
ईचक दाना बीचक दाना दाने ऊपर दाना
जब इस गाने की निम्न पंक्तियां टेप रिकॉर्ड पर शुरू हुई। उसी समय मेरे मित्र सीतारामजी का आगमन हुआ।
हरी थी मन भरी थी, लाख मोती जड़ी थी
राजा जी के बाग़ में दुशाला ओढ़े खड़ी थी
कच्चे-पक्के बाल हैं उसके मुखड़ा है सुहाना
इन पंक्तियों को सुनते ही सीतारामजी के अंदर का व्यंग्यकार जाग गया।
सीतारामजी इन पंक्तियों को सुनने के बाद कहने लगे इन पंक्तियों में,मक्के के भुट्टे को स्त्री लिंग की उपमा दी है।
मक्के के दानों को कीमती मोती कहा है। मक्के के दाने जिन पत्तों से ढके रहते हैं, उन पत्तों को दुशाले की उपमा दी है। पत्तों और मक्के के दानों के बीच जो मुलायन रेशे होते हैं, उन्हे कच्चे पक्के बाल कहा है।
मक्के की फसल खेत में उगाई जाती है। इसी उपज को किसान रात दिन परिश्रम कर पैदा करता है।
मक्का यह गरीब का आहार है।
इस आहार को उक्त पंक्तियों में सामंती बना दिया है।
आज बाजारवाद के दौर में यही तो सब चल रहा है। उत्पादों की अनिवार्य उपयोगिता को उपभोग की वस्तु बना दिया है।
उत्पादों की बाह्य साज सज्जा को कीमती आवरण से श्रृंगारित कर बेचा जा रहा है।
बाजारवाद ने मक्का की धानी को बेशकीमती बाक्स में भर कर, कईं गुना अधिक मुनाफे के साथ बेचा जाता है।
ठीक इसी तरह राजनीति में हो रहा है। सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनों में उपलब्धियों को दर्शाया जा रहा है। हर एक सूबे के मुखिया अपने सूबे की कथित उपलब्धियों को पूरे देश के समाचार पत्रों में विज्ञापित करते हैं।
निश्चित ही विज्ञापनों में होने वाला व्यय आमजनता का ही होता है?
गीत की ये पंक्तियां भी भी बहुत मनोरंजक हैं।
एक जानवर ऐसा जिसके दुम पर पैसा
अपने देश राष्ट्रीय पक्षी का खिताब प्राप्त पक्षी मोर के पंखों को पैसों की उपमा दी है।
हकीकत में मोर की हत्या कर उसके पंखों को बेचा जाता है।
तांत्रिक लोग मोर पंखों की
की झाड़ू हाथों में थामकर
अंधभक्तों की सारी समस्याओं को दूर करने का ढोंग करते हैं।
इसे तांत्रिक की भाषा में झाड़ फूँक कहते हैं।
शशिकांत गुप्ते इंदौर




