कला-साहित्य
नफ़रत।

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
क्या माहौल है ?
बस समझिए घृणा और विरक्ति का,
मंजर आज़ खूब फल-फूल रहा है,
ज़िन्दगी की खुशबू और खूबसूरत श्रृंगार,
ही डांवाडोल है।
अपने स्वार्थ में लोग डूबे हुए हैं,
निस्वार्थ भाव से सना हुआ,
संस्कार अब बस किताबों में ही,
रह गया है,
नजदिकियां खत्म हो गयी है,
प्रेम और विश्वास,
से दूर दूर का रिश्ता मानों सज गई हैं,
कुत्सित मानसिकता से ग्रस्त,
सारा जहां है,
बेचैनियां आज़ चरम पर है,
खुशियां खत्म हो गई है,
नज़रें चुराना आम बात है,
बस मतलब के साथ जीना मरना ही सही और सटीक,
स्वार्थ और निन्दा से भरपूर वातावरण,
अब लगता हो गया आम बात है।
कुछ शर्मिंदगी महसूस नहीं करते हैं लोग,
लगता है कि इन्सानियत मर गया है आज़,
नहीं निकल रही है किसी के मुंह से कोई मीठी आवाज।
डॉ ०अशोक, पटना,बिहार।




