कला-साहित्य

पूजा और नियम

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

वाराणसी की सोसाइटी में मिसेज वर्मा दो वर्ष पहले ही रहने आयी थी, फ्लैट कल्चर होने के कारण लोग अपने मे ही मस्त रहते थे। एक दूसरे के घर मे क्या चल रहा, कोई नही जानता था। वाराणसी में रहते हुए भी मुम्बई के वातावरण को चरितार्थ करने की कोशिश में थे।

नवरात्रि में अष्टमी के दिन मिसेज वर्मा नौ कन्या हमेशा से पूजती थी, पर इस बार वो चिंतित थी, क्या करें। अपने श्रीमान जी से बोल पड़ी, “यहां तो आस पास बच्चे दिखते ही नही, किसी के एक या कोई सिर्फ कुत्ते को ही गोद मे उठाये रहता है, मैं कन्याओं को कैसे ढूंढ कर लाऊं।”

“तुम भी न, पुराने नियम ढोती रहोगी, जो खिलाना हो मंदिर जाकर किसी को दे देना।”

दूसरे दिन वो गंगा किनारे सुबह ही पहुँची, स्नान किया, सीढ़ी चढ़ रही थी , कि एक कन्या, हाथों में मेहदी और एक टोकरी जिसमे उसने फूल , बत्ती और आचमन की वस्तुएं रखी थी, उनको रोक कर मीठी सी आवाज़ में बोली, “माई, फूल ले लो, सब मंशा पूरी होगी।”

मिसेज वर्मा उसे ध्यान से देखने लगी, उन्हें वो देवी का रूप ही लग रही थी, “लाओ दो, कितना दे दूं।”

“दस रुपये”

“ठीक है, सुनो, तुम्हारा नाम क्या है, थोड़ी दूर पर मेरा घर है, आज देवी की पूजा है, फिर तुम्हे खाना खिलाऊंगी, गिफ्ट दूंगी।”

“नही, माई, जो देना है, यहीं ला देना, मेरे बापू कहते हैं, गंगा किनारे ही रहना, यहां सबका मन शुद्ध रहता है, किसी के घर कभी मत जाना।”

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button