कला-साहित्य

बस यूँ ही 16

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

मरी हुईं आत्माएँ जिन्दा मार देती हैँ मुझे

मैं मरा हुआ भी उनके सभी काम आता हूँ

वस्त्र औषधि घर ईंधन बांध देता न चैन तुझे

मरा हुआ भी मैं मानव को मोक्ष दिलाता हूँ।।

न रोने देना जगत पिता किसी को

न सूखने देना पानी आंखों का

हुई पानी की कमी कुछ आंखों को

मानव की आंखों में गए आंसू आ।।

मेरे आंसू पहचान ना सका तू

अपने दिल की तो मान ना सका तू

दिल से फेफड़े तक भी बात आई

मुझ वृक्ष की कीमत जान ना सका तू।।

पाप से बड़ा एक पाप और वह कर जाता है

परमपिता ईश्वर पर जब वह दोष लगाता है

जगत में कठपुतलियां बनाकर वह रुलाता है

पाप व पुण्य के जाल में मानव को फंसाता है।।

फूल पत्तियाँ जड़ें तना फल हों चाहे छाल

ढकते तन तुम्हारा धूप हो  देत हैँ छाँव

हर मौसम से रिश्ता भावना का नहीं नाप

अंतिम वृक्ष जब बचेगा तब क्या करोगे आप।।

ईश्वर की विशेष कृपा रही मानव पर

मुकुराहटें बिकने नहीं दीं बाजारों में

वरना पाबंदियाँ भी होतीं कितनों पर

कुछ लोग तो देखते केवल ख़्वाबों में।।

दादी ने बताई पेड़ों की इस तरह बात25

फूल फल न भी दें झड़ जाएँ जब सारे पात 24

लकड़ी आवे इसकी काम आवे काम छाल 25

बर्तन धोवे  पेड़ जब जरै बन जावे राख 24

मेरी खुशियों पर कोई लगाए पाबंदियाँ

पर मैं अपनी आदतों से मजबूर हूँ ना

मुझे तो दूसरों की खुशियाँ देखकर भी

मिल जाती है हाँ मिल जाती है बड़ी ख़ुशी।।

तू पहचान कब तक छिपा सकता है अपनी

साथ हमेशा रहेगी छली तेरी करनी

तेरे सभी कर्म  ईश्वर नजर से देख रहा

नाम संग तेरे माँ -बाप का नाम चल रहा।।

जिसे तुम सबक कहते हो सबक नहीं

ईर्ष्या नफरत का भाव है यह सभी

सबक देने की बजाय सबक लेते

लोग तुम्हारा नाम कुछ और लेते।।

राम ही आदर्श राम पिता राम परमात्मा हैँ

राम से जीना मरना राम की यह आत्मा है

राम नाम बुरे अर्थ में जब भी लिया जायेगा

तेरा सारा किया पुण्य धरा पर रह जायेगा।।

मेरी खुशियों पर कोई लगाए पाबंदियाँ

पर मैं अपनी आदतों से मजबूर हूँ ना

मुझे तो दूसरों की खुशियाँ देखकर भी

मिल जाती है हाँ मिल जाती है बड़ी ख़ुशी।।

विज्ञान का वक्त तो देखिए विज्ञान छुए आसमान

लोहा जुड़े पीतल जुड़े जुड़ रहा है अब कांच

विज्ञान वो कभी न आएगा जो जुड़ सके विश्वास

विश्वास की रखो लाज इसी से मानव की जात।।

गिरगिट को ना बेबजह बदनाम किया जाए

मित्रता करते वक्त कुछ संतुलन भी रखा जाए

गिरगिट बिन दोष जान खातिर रंग बदलता

धूर्त मनुष्य धोखा देने खातिर रंग बदलता।।

कितने भी कंटक पत्थर क्यों न मिलें मुझे राह में

क्यों डरूं मैं पाँव और दिल चीरने वालों से

सूरज सिर्फ औरों को ही नहीं उगा करता है

हर भोर कहे सूरज मुझे भी उगा करता है।।

यह वक्त अपना है सोचना गलत फहमी है

सभी ताकतें इस वक्त के आगे सहमी हैँ

वक्त अच्छा या बुरा कभी ठहरा ही नहीं है

बिना पढ़े पढ़ जाता है यह पाठ वही है।।

ठोंकरें  लगें भी तो ठोकरों की क्या शिकायत करुँ

अगली साँस देकर तूने मरने से बचाया है प्रभु

रौशनी की महत्त्व अँधेरे से ही दिखता हे मेरे प्रभु कष्टों को सहना जैसे कोई परीक्षा उत्तीर्ण करुँ।।

पूनम पाठक बदायूँ

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