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भारत की जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्रवाई उसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियों से बढ़कर: यादव

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

नयी दिल्ली : केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को कहा कि भारत ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में नेतृत्व की भूमिका स्वीकार की है और इस दिशा में उसकी कार्रवाई नैतिक एवं कानूनी जिम्मेदारी से कहीं बढ़कर हैं। स्वतंत्र और गैर-लाभ वाली संस्था इंटीग्रेटिड रिसर्च एंड एक्शन फॉर डवलपमेंट (आईआरएडी) द्वारा यहां आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित करते हुए यादव ने कहा कि 2070 तक ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन के लक्ष्य को पाने के लिए भारत में ऊर्जा की बढ़ती मांग को कम कार्बन उत्सर्जन वाले स्रोतों से पूरा करना होगा।‘नेट जीरो’ का अर्थ यह है कि सभी देशों को जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए कार्बन के उत्सर्जन में तटस्थता लानी होगी।

इसका आशय है कि वातावरण में पहुंचाई जा रहीं ग्रीनहाउस गैसों और हटाई जा रही गैसों के बीच संतुलन बनाया जाए। भारत ने एक सप्ताह पहले ही पेरिस समझौते के तहत राष्ट्रीय स्तर पर अद्यतन निर्धारित योगदान (एनडीसी) को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मलेन(यूएनएफसीसीसी) को सौंपा है और इस बात पर जोर दिया है कि यह 2070 तक ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन के उसके दीर्घकालिक लक्ष्य तक पहुंचने की दिशा में एक कदम है।

यादव ने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन संभवतरू सबसे बड़ी मौजूदा चुनौती है जिसका सामना मानव जाति और हमारी धरती कर रही है। उत्सर्जन में प्रभावी तरीके से और पर्याप्त कमी के लिए दुनियाभर में समन्वित कार्रवाई का समय है। इसे तापमान बढ़ने के अपरिहार्य प्रभाव के प्रबंधन के लिए अनुकूलन प्रयासों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकसित देश विकासशील देशों की कीमत पर तरक्की कर रहे हैं। यादव ने कहा कि भारत की पूर्व-औद्योगिक काल से वैश्विक समग्र उत्सर्जन में केवल करीब चार प्रतिशत की भागीदारी रही है।

यादव ने कहा कि सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत का महज करीब एक-तिहाई है। उन्होंने कहा कि मुख्य रूप से विकसित देशों से होने वाले समग्र उत्सर्जन ने वैश्विक तापमान को काफी बढ़ाया है। पर्यावरण मंत्री ने कहा, ‘‘इसके बावजूद, भारत ने बुद्धिमता का परिचय दिया है और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में नेतृत्व की भूमिका को सक्रियता से स्वीकार किया है। आज हमारी जलवायु संबंधी कार्रवाईयां निश्चित रूप से हमारी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी से कहीं बढ़कर हैं।’’

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