कला-साहित्य
भूली बिसरी यादें

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
गोली दंडा कंचा किल्ली
खो खो के खेले खेल
धीरे धीरे बडे हुये जब
किताबों से हो गया मेल
पाटी पोत घूट्टे से रगड़ता
खडिया से ईबारत लिखता
एक तरफ हरी करता पाटी
दुसरी तरफ गिन्ती लिखता
गलती होने से पड़ती डांट
छूट्टी होने की तकता बांट
घंटी बजते समेटे बस्ता
खेलने की पकडाता रास्ता
ऐसा बचपन था हमारा
यादों का रह गया पिटारा
वीरेन्द्र तोमर




