कला-साहित्य

भोले नें आकर थपकाया

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

शीत झूमकर आई भोले ,

अंखियां खोले से मन डोले,

सिमट-सिमट कर लें अंगड़ाई,

शीत नें कैसी उधम मचाई।

शीत झूमकर ….

बदली में छुपते जब सूरज,

भोले भी ठिठुराते हैं,

सुनी पुकार जब भक्तों की तो,

खुद सूरज बन जाते हैं।

शीत झूमकर …..

धरती का कण-कण अलसाया,

पाती ओस से भीग गई है,

भोले नें आकर थपकाया,

और कहते अब भोर हुई है।

शीत झूमकर ….

नदियां और सागर भी सारे,

धुंध में लगते हैं प्यारे,

छवि भोले की आती नजर है,

लुक-छुप जाते हैं तारे।

शीत झूमकर……

सर-सर कर इठलाती पवन है,

कानों में कुछ गा जाती है,

भोले की महिमा मंडित कर,

जीवन को तर जाती है।

शीत झूम कर ….

(138 वां मनका)

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’

सी स्पेशल, गांधीनगर, इन्दौर

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