कला-साहित्य

भ्रमित मन की दुविधा

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

एक विरह की धुधक रही है अंतर्मन में ज्वाला

ऊपर से मुस्कान विखेरे अंदर भरे जहर का प्याला

विरही ही जाने विरही की पीड़ा जो रोता पड़ा अकेला

दुख ही दुख  का बने सहारा बाकी सब मतलब का मेला।

गर्भगृह में पड़ीं बेड़ियां दुख ने आकर दिया सहारा

मां को हुई प्रसव की पीड़ा जन्मा करके उन्हें उबारा

बेमाता के पास रुदनकर पूर्व जन्म की याद बिसारा

जब उबरन लागा अबोधपन से माया ने तब डाला घेरा

बचपन पूजा पाठी बनके खेलकूद में मन बहलाया

किशोरावस्था जागृति आई चेतनता ने मन भरमाया

आभासी चकाचौंध में फंस दिवास्वप्न में समय गमाया

पड़े व्यसन में पीड़ा सहते युवा हुए कब समझ न आया

चला खोजने कारण इसका एकाकी परिवार में पाया

संवादहीनता के कारण प्यार सिमट पोकेट में आया

हुई विलोपित मर्यादायें‌ संबंधों का मूल्य गिराया

पड़े कुसंगति की टोलीमें सिर ऊपर पानी चढ़ आया

जीवनकी परिवार इकाई का परिवेश बनाना होगा

समावेश के मूल मंत्र को अक्षरशः अपनाना होगा

कांटे से कांटा निकलेगा आपस मेल बढ़ाना होगा

आत्मविश्वास जगाने का नित उद्यम करना होगा

बच्चू लाल परमानंद दीक्षित

दबोहा भिण्ड/ग्वालियर

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