कला-साहित्य

अपराध

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

जीने की चाहत में ख़ुद को

क्या-क्या सिखा दिया मैंने

तनहा गुज़रे लम्हों को ही

जीवन  बना  लिया  मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

यादों  के  कुछ  ताने-बाने

नम पलकों के सपन सलोने

आशाओं  की  मृगतृष्णा  में

सब  कुछ  भुला  दिया  मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

मन का पंछी उड़ा गगन में

पंख कटे और गिरा धरा पे

फिर  से  उसमें  प्राण फूँक

अम्बर  पर चढ़ा  दिया मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

दिल की बात कहूँ तो कैसे?

श्रोता  हूँ  बस, वक़्ता नहीं

मन  में  उठते  उद्गारों  को

अन्तस् में  दबा लिया मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

कुछ  ख़ुशी   मिले मन को

तन का ऐसा श्रंगार किया मैंने

काँटों  को  ही  फूल समझ

वेणी  में  सज़ा  लिया मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

ज़ख़्मों  को उपहार जान

संजो कर रखा है दिल में

बार-बार  टूटे  रिश्तों  को

फिर  सम्मान  दिया  मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

किसी राह पर कभी किसी ने

रुक  कर  पूछा  हाल  मेरा

होंठों  पर  मुस्कान  दिखा

आँसू को छिपा लिया मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

अपने  ही  हाथों, अपने

मूल्यों का ह्रास किया मैंने

ध्वस्त  हुए  अवशेषों  में

नवयुग आह्वान सुना मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

झूठे  वादे  कर  ख़ुद  से

ख़ुद को ही दग़ा दिया मैंने

इन्सां  को  भगवान  बना

मन्दिर में बिठा दिया मैंने

बस यह अपराध किया मैंने

प्रेषिका :-

सुभाषिणी गोदारा

मकान न: ३३५

सेक्टर: १७

पँचकूला 

हरियाणा

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