आज के लेखक

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
प्रत्येक भीड़ के जैसे
आज के लेखकों की भी
उमड़ी वृहद भीड़ है,
कुछ प्रशस्ति पत्र बटोर रहे
तो कुछ अखबारों में छप रहे,
पैसे देकर कुछ लोग
किताबों में स्थान पा रहे
तो कोई पारितोषिक के साथ
पत्रिकाओं की शोभा बढ़ा रहे,
किसी की किस्मत सितारों तक,
तो कोई रह जाता पन्नों में दबकर।
प्रतिभा की कमी नहीं,
पर किस्मत सबकी एक सी नहीं,
फिर भी सब खुश हैं अपनी जगह,
कोई गूगल मीट पर कवि सम्मेलन कर,
तो कोई फेसबुक पर प्रसिद्धि पाकर।
बिन मंज़िल के चले जा रहे सभी
आँखों में सपने हज़ार लिए,
शायद साहित्य ही एक ऐसी सेवा है,
झोंक देता है इंसान अपना तन-मन
बिन किसी चीज़ को सुध लिए।
शब्दों का अंतर्द्वंद चलता ही रहता,
समय न होते हुये भी समय निकल ही जाता,
हाँ, कद्रदान बहुत कम हैं इसके
पर अपने दम पर एक लेखक
अपनी दुनियां बना ही लेता।
रीमा सिन्हा
लखनऊ-उत्तर प्रदेश




