कला-साहित्य

कैसे-कैसे ‘मैन’

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

जब से ओटीटी प्लेटफार्म आए हैं, मैं घरवालों की एक नहीं सुनता। ओटीटी पर कोई फिल्म या वेब सीरिज देखता हूँ तो सारे काम सोफे पर ही करता हूँ। खाना-पीना, लेटना, सुनना-देखना यहाँ तक कि 360 डिग्री में खुद को पलटूँगा लेकिन सोफे से टस से मस नहीं होऊँगा।  हर काम सोफे पर करता हूँ। यहाँ तक कि चाय-पानी के लिए भी ऑनलाइन ऑर्डर करता हूँ।

जिंदगी जब एक मिली हो तो उसमें बेफिजुल की तकलीफ वाले काम क्यों करना? मैंने हिंदी, अंग्रेजी यहाँ तक कि सब टाइटिल्स की कृपा से तेलुगु, तमिल, फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश  सारी फिल्में देख डाली हैं। जब पैसा दिया है तब उसका पाई-पाई वसूलना किसी भी जागरूक ग्राहक का अधिकार होता है। फिर चाहे इसके लिए मेरी आँखें मेंढ़क की तरह, पेट गोल गुंबद की तरह ही क्यों न हो जाए। मैं इंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता हूँ।

अंग्रेजी की एक्शन फिल्में और उसमें भी खासकर ‘मैन’ जैसे – स्पाइडरमैन, बैटमैन, सुपरमैन का कहना ही क्या। दुर्भाग्य से हमारे पास एक ही मैन था वह भी शक्तिमान। जो भी हो मैं अंग्रेजों की दाद दूँगा कि वे महिला आरक्षण का पूरा ध्यान रखते हैं तभी तो उन्होंने वंडरवुमैन, बैटवुमैन जैसी फिल्में बनाईं। मुझे अंग्रेजों से कहीं शिकायत है तो उनकी सिक्वेल से। वे बाहुबली या फिर क्रिश की तरह एक-दो या तीन सिक्वेल तक नहीं रुकते। दस-पंद्रह सिक्वेल बनाते हैं। अवेंजर्स, फास्ट एंड फ्यूरियस, स्पाइडमैन, बैटमैन की न जाने कितनी सीरिज हैं। पहली न देखो तो दूसरी समझ में नहीं आती।

इसलिए सभी देखनी पड़ती हैं। अंग्रेजों को रामानंद के रामायण और बीआर चोपड़ा के महाभारत में दिखाई गई शक्तियों पर संदेह होता है, जबकि उन्हें हरीपुत्तर को झाडू पर बैठाकर हमारी जेबों पर झाड़ू लगाने में तनिक भी संदेह न हुआ और न ही शर्म आई। मेरा सर तो तब चकराया जब मैंने स्पाइडरमैन सीरिज की स्पाइडरमैन, अमेजिंग स्पाइडरमैन और मार्वलस स्पाइडरमैन देखी।। जब सभी का काम खलनायक को मारना ही तो है, तब इतने सारे स्पाइडरमैनों की क्या जरूरत है।

मैंने आखिरी बार स्पाइडरमैनः नो वे होम देखी थी। यह पुरानी स्पाइडरमैन फिल्मों की सिक्वेल है। इसे देखने के बाद मुझे अपने घर का पता याद नहीं रहा। कुछ देर के लिए मैं एकदम ब्लैंक हो गया। खोपड़िया चकराने लगी। फिल्म में कहानी के नाम पर कुछ था ही नहीं। लगता है निर्देशक बेवकूफ बनाने में बड़ा एक्सपर्ट था। उसने पुरानी स्पाइडमैन फिल्मों के सभी नायकों को इसमें ठूस दिया। अब जब उन्हें ठूस दिया तब खलनायकों को भी ठूसना पडेगा न! सारे के सारे पुराने खलनायक भी आ गए। इन सबको देखने के बाद मुझे हमारे यहाँ की मनरेगा योजना याद हो आई। सभी को इसी तरह तो काम दिया जाता है।

फिल्म में एक बंदे को कोलंबिया विश्वविद्यालय में सीट न मिलने के कारण वह नए ग्रह की खोज कर डालता है। उन मूर्खों को कौन समझाए हमारे यहाँ किसी का कहीं दाखला नहीं होता तो विधायक या सांसद की सिफारिश लगाते हैं। बस बात खत्म। उन्हें भी कुछ ऐसा करना चाहिए था। भला कोई बेवकूफ नया ग्रह खोजता है! मुझे यह समझ नहीं आता जब आदमी एक धरती से ही इतना परेशान है तब दूसरी की क्या जरूरत है। निर्देशक की भी क्या गलती है। उसे पता है जब पागल बनने के लिए दुनिया पड़ी है, तब पागलपंती की फिल्म बनाने में क्या हर्ज है।

स्पाइडरमैनः नो वे होम में खलनायकों को देखने के बाद पिताजी ने पूछा – यह खलनायक कौन है और वह ऐसा क्यों कर रहा है? तब मैंने कहा – वह पिछली फिल्म में नायक का अपहरण कर उसके ससुर की बेटी से अपने प्यार का बदला लेने के लिए यह सब कर रहा है। इस पर पिताजी ने कहा – जब तुझे इतना सब कुछ पता है तब डिग्री में इतने सारे बैकलॉग्स के पहाड़ लादे क्यों बैठा है? मेरे पास जवाब नहीं था और पिताजी के पास माँ से लड़ने की हिम्मत।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button