कला-साहित्य
कब जिंदगी की शाम हो जाये

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
वाणी को अपनी वीणा बना ले ,
जीवन मधुर संगीत की तान बना ले ।
क्या पता कब वक्त ठहर जाये
कब जिंदगी की शाम हो जाये ।
जिधर भी चलो फूलों सी महक आये,
कर्म हो ऐसे की सबको भा जाये।
क्या पता कब सांसो की डोर टूट जाये,
कब जिंदगी की शाम हो जाये।
रोते आये थे रोते चले जाये,
बाते मुलाकातें अधूरी रह जाये ।
ना गिला कीजिये ना शिकवा पालिये,
क्या पता कब जिंदगी की शाम हो जाये।
ज्योति नव्या श्री
रामगढ़ , झारखंड




