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पुस्तक समीक्षा – बातों को चित्र

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

बातों के चित्र पुस्तक जब मेरे हाथ में आई तब अनायास ही मेरे मानस पटल पर सादगी संग शालीनता का एक चित्र उभर आया। जब भी हम कोई पुस्तक देखते हैं सबसे पहले उसका आवरण या मुख पृष्ठ देखते हैं। बातों के चित्र का आवरण चित्र और उसकी आवरण सज्जा नें मुझे बहुत प्रभावित करा। हल्के नीले रंग का आवरण पृष्ठ उस पर तार पर बैठी चिड़िया या कोई पंछी आसमान को निहार रहा है। लगता है, मानों सम्पूर्ण आसमान उसके आगे बाहें फैलाये खड़ा है।और कह रहा है जितनी ऊंची उड़ान भरने की इच्छा है उड़ लो। थक जाओ तब वापस आकर यहीं कहीं बैठ जाना और फिर से पूरी शक्ति बटोरने के बाद पुनः ऊंची उड़ान भरने को तैयार हो जाना। अर्थात् इस आसमान की भांति सारा जहां तुम्हारे लिये उपलब्ध है। बस अपने पंख को हौंसले की उड़ान समय-समय पर देते रहना। बातों के चित्र पुस्तक के आवरण पृष्ठ को गरिमामयी छ्वी प्रदान करने के लिए युवा रंग निर्देशक – चिंतक सौरभ अनंत और अमित कुमार श्रीवास्तव का प्रयास सुंदर एवं सराहनीय है। बातों के चित्र पुस्तक पढ़ने के पश्चात् यह लगा कि यह पुस्तक युवा पीढ़ी को यह संदेश दे रही है कि विचारों की उड़ान उड़ो,लेकिन अपनी जगह मत भूलों।इस पुस्तक की लेखिका विशाखा राजूरकर राज की रचनाओं में मैंने पाया है कि जब हम प्रेम करते हैं तब हम दिमाग का उपयोग अधिक नहीं करते हैं। क्यों कि प्रेम दिमाग से नहीं दिल से करा जाता है। चाहे तितलियां बटोरने वाली लड़की के या पहली दफा प्रेम के करीब हो।” प्रेम कविताओं का जन्म ” यूं ही नहीं हो जाता है। प्रेम में डूबना और उसमें से उबरना तो पड़ता ही है। चाहे मौन की भाषा हो या हो टूटे तारे की मौजूदगी।  सागर की लहरों के समान बातों के चित्र को अद्भुत बना रही है। बातों के चित्र पुस्तक में कवियत्री विशाखा नें दर्द कों बहुत ही मार्मिक अंदाज में चित्रित करा है। उनके चित्रण में ऐसा प्रतित होतार है कि दर्द को भी दर्द होता है। और दर्द अपना दर्द आखिर किससे कहे।

दर्द भाप बन गया। भाप, बादल

बादल उठा ही था उड़ने को और

सुई चुभ गई।बादल फूट पड़ा मैं

भीग गई।काजल बह गया। और

गहरा उतर आया मुझमें,नसों रगों

तक त्वचा के अंदर।

बातों के चित्र पुस्तक में लिखी सभी कवितायें संवेदनशील हैं।गुरुदेव हेमंत देवलेकर के आशीष वचन से समृद्ध यह पुस्तक सहज और दिल से लिखी हुई प्रतीत होती है। पुस्तक में विशाखा नें बहुत ही सादगी से प्रेम के मर्म को बेबाक अभिव्यक्ति से नवाजा है। प्रेम संबंधों को बड़ी ही निष्पक्षता से परत दर परत खोल कर रख दिया है ।जीवन की कश्मकश के साथ भावनाओं का ज्वर शब्दों का चित्रण,शब्दों को तोलमोलकर बखूबी सधे हुए कलाकार की भांति चित्रित करा है। बातों के चित्र में कहीं-कहीं कुछ रचनाएं अचार सी चटपटी लगती हैं तो कहीं मिश्री की मिठास के साथ ही कुछ पकी तो कुछ अधपकी सी भी लगती हैं। यह पुस्तक अपने को समझने के लिए समय मांगती हैं। पुस्तक में प्रेम में कहीं वेदना तो कहीं गहरी संवेदना नजर आती है। कभी प्रेम को पा लेना तो कभी उसी प्रेम की भूलभुलैया में खो जाना ही बातों के चित्र को अपने पन के रंगों से भर देता है। बातें करते – करते बातों के चित्र बना लेना और उन चित्रों में प्रेम के चरित्र को गढ़ना और उसे अपने तरीके से मढ़ना,फिर मढ़ते – मढ़ते उन चित्रों में प्रेम को तलाशना उतना आसान भी नहीं। बातों के चित्र में कहीं कहीं सामान्य शब्दों को दार्शनिक अंदाज में प्रस्तुत करा गया है। कवियित्री नें यथार्थ संग शब्दों का ताना बाना बहुत खूब बुना है। प्रेम के माध्यम से छोटी सी पुस्तक में प्रेम को समेटने और सहेजने का प्रयास बार-बार करा गया है।

रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार

 ramamedia15@gmail.com

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