कला-साहित्य

चन्दा तेरी चाँदनी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

चन्दा तेरी चाँदनी

इतना दर्द क्यूं देता है

तेरी नजर में जग खूबसूरत है

पर मुझे अँधेरा क्यूँ लगता है

चन्दा तेरी चाँदनी

इतना खुदगर्ज क्यूँ दीखता है

सत्ता की कुर्सी  पर जमकर

सत्ता की भूरव क्यूँ लगती है

चन्दा तेरी चाँदनी

बेवकूफ क्यूं जग को बनाती है

परिजन चले थे हटाने गरीबी

पर खुद अमीर बन जाता है

चन्दा तेरी चाँदनी

बेबस दपर्ण क्यूं लगती है

कल तक समझता था मूरख

अब खुद मूरख बना दीखती है

चन्दा तेरी चाँदनी

सूरत बदसूरत क्यूं दीखती है

कल तक चेहरे नकाब में छुपा था

आज बेनकाब में दीखती है

चन्दा तेरी चाँदनी

गरीबों की दर्द कहाँ सुनती है

गरीब मजबूर का दर्द सुनने

कोई नहीं यहाँ दीखता है

चन्दा तेरी चाँदनी में

नग्नता की दृश्य ही दीखती है

भारतीय संस्कार चुप रो रही है

अश्लीलता तांडव नृत्य करती है

चन्दा तेरी चाँदनी

झोपड़ी में रात भर जगती है

भूख से बच्चे रोते है

भूख सोने नहीं देती है

चन्दा तेरी चाँदनी

ईमानदारी भीख माँगती है

बेईमानों की दुकान सजी है

बेईमानों की चाँदी कटती है

चन्दा तेरी चाँदनी में

अन्नदाता मुश्किल से जीता है

जो जग का पेट भरता है

खुद भूखा सो जाता है

उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088

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