कला-साहित्य
चुप

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
तुम्हे सोचा तो मैंने था,
तुम समझ ही लेते।
चुप तो मेरे दामन मे,
बड़ी आवाज़ करता है,
तुम ये शोर सुन ही लेते।
चुप सी रह गई हूँ मै
कहीं पर को गई हूँ मै।
खामोशी मे डरता बहुत है मन,
तुम आवाज़ दे देतें।
बड़ी शिद्दत से चाहा था,
साँसों मे बसाया था।
चुप क्यो रह गए थे तुम,
कुछ अल्फ़ाज़ के देतें।
बड़ी नादानियां थी मुझमे,
बड़ी खामियां भी थी मुझमे।
पर तुमको दिल मे रखा था,
पर तुम दिल ही रख लेते।
तुम्हे सोचा तो मैंने था,
तुम समझ ही लेते।
सरिता प्रजापति,वरिष्ठ गीतकार
कवयित्री व शिक्षिका ,दिल्ली



