तिमिर (छप्पय छंद )
युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
मिटा तिमिर मन आज,नाम जप राधे -राधे |
वही बनाता काज, वही सब साधे -साधे ||
मिलती शीतल छाँव, कृपा है उनकी प्यारे |
उगले सूरज आग,जान ले सबको तारे ||
अखिल विश्व ब्रम्हाण्ड में, सत्ता उसकी व्याप्त है |
मनुज नेत्र अब खोल तू,कण -कण हरपल आप्त है ||
रचे विधाता खेल,अचंभित दुनिया होती |
कैसा है ये मेल,तिमिर उजियारा बोती ||
माया का संसार, सकल जग अपना दिखता |
प्रेम जगत का सार, अधर रस लेखन लिखता ||
मिले कृपा जब राम की, होता तब वैराग्य है |
बंधन सारे टूटते,जागे सब सौभाग्य है ||
करना पथ का त्याग, झूठ से बढ़े पिपासा |
तिमिर जगाये भाग, जागती मन में आशा ||
सुख -दुख दोनों एक, समझ सम मेरे प्यारे |
काज धर्म है नेक, सुधारस पी अब न्यारे ||
भक्ति भाव के दीप से, कृपा मिले है ईश की |
नश्वर यह संसार है, परम पिता जगदीश की ||
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कवयित्री
कल्पना भदौरिया “स्वप्निल “
लखनऊ
उत्तरप्रदेश




