कला-साहित्यविचार

तुम मेरे माहताब हो साहब

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

तुम   मेरे   माहताब   हो   साहिब,

जिंदगी  की  किताब  हो  साहिब।

खार   में  भी   जो  मुस्कुराता  हो,

तुम  खिलता  गुलाब  हो  साहिब।

आपसे मिल के  दिल ये कहता है,

चमकता   आफताब  हो  साहिब।

तिश्नगी    मेरी    जो   बुझा  पाये,

तुम जन्नत की  आब  हो  साहिब।

मयकदा  भी  शरम से  छुप जाए,

तुम  छलकी  शराब  हो  साहिब।

जो   मुझे   हर   घड़ी  सताता  है,

तुम   उल्फत  ख्वाब  हो  साहिब।

जिंदगी    उलझी   है  सवालों  में,

एक  तुम ही  जवाब  हो  साहिब।

लक्ष्मी आज  उनसे  मिलकर तुम,

हो   गयी  लाजवाब  हो  साहिब।

पुष्पलता लक्ष्मी,वरिष्ठ कवयित्री व 

शिक्षिका,रायबरेली-उत्तर प्रदेश

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