कला-साहित्य
पिता को सादर समर्पित

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
मेरे पिता कहीं नहीं गए आप,
आप हैं मेरी उठी नज़र में,
मेरी गर्वीली ग्रीवा में।
हौसले से तने मेरे कंधों में,
मेरी सधी-सीधी रीढ़ में,
मेरी समझने की शक्ति में,
सच को कह देने की मेरी हिम्मत में,
बिना स्वर ऊँचा किए
असहमति कह देने में,
मेरे पिता कितना अनोखा था,
आपका मन रोया,
प्रेम किया,हँसा,हंसाया,
कभी भूखे पेट बिस्तर पर,
जाने न दिया।
कितना अनोखा था आपका प्रेम,
मुस्कुराया,हँसाया,
दर्द बांटना सिखाया,
कभी चुप रहकर सब,
कुछ सहना सिखाया!
कितना अनोखा था आपका दुःख,
आया, हाथ पकड़ा,
जितने भी खाली कोने थे
वहाँ मुस्कराते हुए ले गया।
सौंपूँगी सहर्ष यही विरासत अब मेरे,
पिता आप रहेंगे रहती दुनिया तक।
डिम्पल राकेश तिवारी अयोध्या- उत्तर प्रदेश




