कला-साहित्य

प्रेम दिवस (इश्क़)

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

खिज़ा में खूबसूरत बहार है इश्क़,

जो कभी न उतरे वो खुमार है इश्क़।

इश्क़ ही जन्नत,इश्क़ ही मन्नत,

सहरा में सब्ज़ गुलज़ार है इश्क़।

मशरूफियत में सुकूँ का पल है,

हफ्ते में छुट्टी का इतवार है इश्क़।

आसां नहीं इश्क़ की रहगुज़र यह,

वादे और वफ़ा का करार है इश्क़।

चट्टानों पर भी खींच डाले लकीरें,

वो दरिया का तेज़ धार है इश्क़।

परिपक्व इतना कि फतह कर ले दुनियां,

अक्ल से मगर बीमार है इश्क़।

लम्हें सोगवार,नासूर दर्द में भी सुकूँ,

पल पल जो बढ़े वो बुख़ार है इश्क़।

टूटे साज पर जो सुना दे धुन,

ऐसा वो फनकार है इश्क़।

           रीमा सिन्हा(लखनऊ)

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