कला-साहित्य
मैं कैसे हार मान लूँ?
युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
रंग बदलता अंबर,
बदल रहा है पहर,
टिक-टिक घड़ी की सुईयाँ
चल रही, रुकी नहीं,
नदियों ने जो राह पकड़ी
प्रवाह है टूटी नहीं
तूफानों में शाखाएँ अस्त-व्यस्त हुईं,
फिर तन गई, झुकी नहीं,
कलरव से पक्षियों ने भोर किया,
घोसलों के उड़ने का शोक रहा,
रखी लेकिन चुप्पी नहीं,
सभी गतिमान हैं,
हार पर ही टिके नहीं,
शोक पर न अटक गए,
ना रुके वहीं हारकर
जहाँ बाधाएँ रहीं,
आगे बढ़े सभी ने मन में
उत्सव गीत कहे।
प्रकृति में जब विजय गान कर
सब आगे बढ़ रहे,
कहो मैं कैसे हार मान लूँ!
— लवली आनंद
मुजफ्फरपुर, बिहार




