आलेख

“सतरंगी जिह्वा”

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

अक्सर खुशियों की धूप मेरी ऊँगलियों को छूकर गुज़र जाती है लकीरें तड़प कर सुबक जाती है।

मुठ्ठी हरदम खाली रही तरंगी जिह्वा की मछली ज़िंदगी की नमी को तरसती छटपटाते सहम जाती है।

आकाश गंगा सा ख़्वाबों का वितान सूना सा पड़ा, पनपने से पहले ही सपनों की कोंपले सूख जाती है।

नासूर से लम्हें वक्त के साथ बहते नहीं मेरे मन की धरा पर मुकाम बनाते सहसा ठहर जाते है।

रोना ही रोना है भाता रुठे हुए है कण-कण, गगनदीप में एक भी तारा मेरे नाम का नहीं दिखता।

मुँह गडाएं पड़ी हंसी पलकों पर बूँदें दो ठहरी, तीखे कांटे भरे पड़े मेरा आकुल बड़ा है अंतर।

संबल मेरा कोई नहीं शूलों से दामन महक रहा, तन के भीतर मांस जले वहाँ शीत मरहम को कहाँ ढूँढे।

नज़रें तलाशे दूर दूर तक मृगजल मोहक सा लुभाए, कफ़न मखमली बाँहें फैलाता क्यूँ मेरी ओर ही भागे।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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