कला-साहित्य

“गुलशन उजड़ गया”

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

बैठ पेड़ की छाया में, मस्त मगन हम रहते थे।

कितना सुन्दर दृश्य था, जब प्रकृति से बातें करते थे।।

खेलते रहते पेड़ों के नीचे, झूलते उनकी टहनियों में।

मन को कितना सुकून मिलता, चलती हवा जब गर्मियों में।।

कोयल की मीठी बोली सुनते, और कौंए की काॅ॑व वहाॅ॑।

गुलशन उजड़ गया देखो, अब वो प्यारा गाॅ॑व कहाॅ॑।।

चिड़िया चूॅ॑-चूॅ॑ गान सुनाकर, सबको सुबह जगाती थी।

रंग बिरंगी तितली रानी भी, मन को बहुत लुभाती थी।।

सुरभित, पुलकित, कलियाॅ॑ खिलतीं, मंद सुगंध पवन बहते थे।

देख मनोरम इस दृश्य को, सब मोर बनकर झूम उठते थे।।

जल में फुदकती रहती मछली, अब वो पुराना ताल कहाॅ॑।

गुलशन उजड़ गया देखो, दिखते अब इमारत जाल यहाॅ॑।।

नदियों-सड़कों के किनारे, पेड़ों की सुंदर छाया थी।

प्रकृति की गोद में रहकर, हमारी तंदरुस्त काया थी।।

सांस लेने को शुद्ध हवा, हमको आज नसीब नहीं।

गुलशन उजड़ गया देखो, रोता बैठा गरीब कहीं।।

स्वार्थी बन सब वृक्ष काटे, खड़े किए मशीन यहाॅ॑।

गुलशन उजड़ गया देखो, अब हरी भरी जमीन कहाॅ॑।।

द्रौपदी साहू

हवेली चौक छुरी कला, कोरबा, छत्तीसगढ़

मोबाइल नं- 8827020265

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