कला-साहित्य
उनका मिलना नसीब है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क
निगाहें झुका कर देखना अजीब है,
वो दूर रहकर भी कितना करीब है।
चाहत और हसरत में बहुत फर्क है,
दोनों का साथ मिलना,खुशनसीब है।
वो दर्द सहकर भी मुस्कुराता है,
मेरा हमदम भी कितना अज़ीज़ है
बने-बनाए आशियाने से क्या करना,
उसके निगहबानी में,बनना लजीज है।
मैं खुश हूं उसकी पनाह में यारों ,
जाने किस लम्हा दिल बना कनीज है।
सब देखकर हंसते हैं दीवानगी मेरी,
इंशा अल्लाह उसका मिलना नसीब है।
अनुपम चतुर्वेदी, सन्त कबीर नगर, उ०प्र०
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